BREAKING | CEC ज्ञानेश कुमार के 14 आदेशों को रद्द करने को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका

  • BREAKING | CEC ज्ञानेश कुमार के 14 आदेशों को रद्द करने को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका

    बॉम्बे हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की गई। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार द्वारा लिए गए 14 फैसलों को चुनौती दी गई। आरोप है कि ये फैसले अन्य दो चुनाव आयुक्तों - डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी - की दर्ज आपत्तियों के बावजूद लिए गए। इससे भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के सामूहिक कामकाज पर सवाल उठते हैं।

    कोल्हापुर बेंच के सामने वकील असीम सरोदे के ज़रिए दायर इस याचिका में आरोप लगाया गया कि मतदाता सूची, मतदाता पंजीकरण, मतदाता सूची डेटाबेस और चुनावी पंजीकरण अधिकारियों के कामकाज से जुड़े फैसले जिस तरह से लिए गए, वे कानूनी नियमों के पालन और संवैधानिक कामकाज से जुड़े गंभीर सवाल खड़े करते हैं।

    याचिका में भारत निर्वाचन आयोग (ECI) और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार द्वारा पिछले दस महीनों में जारी 14 प्रशासनिक आदेशों और कार्यों को रद्द करने की मांग की गई। 'द इंडियन एक्सप्रेस' की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, इन फैसलों पर चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आपत्ति जताई थी। इन आपत्तियों में नए मतदाता पंजीकरण के लिए 'फॉर्म 6' में बदलाव, मतदाताओं के नाम हटाना और बहाल करना, SIR प्रक्रिया के दौरान मतदाताओं के नाम बहाल करने के आदेशों के खिलाफ अपील, और मतदाता सूची डेटाबेस का प्रबंधन और उस तक पहुंच जैसे मामले शामिल थे।

    रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि संधू और जोशी ने उनकी जानकारी या मंज़ूरी के बिना लिए गए कुछ फैसलों पर आपत्ति जताई। इनमें 'फॉर्म 6' में किए गए "अनधिकृत और गैर-कानूनी" बदलाव और मतदाता सूची डेटाबेस तक पहुंच का धीरे-धीरे केंद्रीकरण शामिल था। बताया जाता है कि दोनों आयुक्तों ने मतदाता सूची संभालने वाले IT इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े काम के बंटवारे में बदलाव को लेकर कैबिनेट सचिव से भी संपर्क किया। उनका आरोप था कि ये बदलाव उनकी जानकारी के बिना किए गए।

    याचिका में कहा गया,

    "यह PIL उस तरीके को चुनौती देती है जिससे ECI ने देश में मतदाता सूचियों को तैयार करने, उनमें संशोधन करने और उन्हें बनाए रखने, तथा चुनाव कराने से जुड़े फैसले लिए और लागू किए। ये फैसले संधू और जोशी की दर्ज आपत्तियों के बावजूद लिए गए, खासकर मतदाता पंजीकरण, मतदाता सूची डेटाबेस और चुनावी पंजीकरण अधिकारियों के कामकाज से जुड़े मामलों में।"

    याचिकाकर्ताओं ने 14 विवादित कार्यों को रद्द करने और हटाए गए मतदाताओं के नाम वापस जोड़ने की मांग की।

    याचिकाकर्ता वोटर लिस्ट के मैनेजमेंट से जुड़े संवैधानिक नियमों के लगातार उल्लंघन से परेशान हैं। इससे आर्टिकल 14 के तहत समान व्यवहार के उनके मौलिक अधिकार और आर्टिकल 326 के तहत वयस्क मताधिकार के जरिए वोट देने के उनके संवैधानिक अधिकार पर सीधा असर पड़ता है। याचिकाकर्ता 14 विवादित कार्यों को रद्द करने, महाराष्ट्र में SIR प्रक्रिया को रोकने, हटाए गए मतदाताओं के नाम वापस जोड़ने, कानूनी रूप से सही वोटर लिस्ट तैयार और मंज़ूर होने तक राज्य विधानसभा चुनाव टालने और कथित अनियमितताओं की जांच के लिए एक स्वतंत्र न्यायिक समिति बनाने की मांग कर रहे हैं।

    उन्होंने कानूनी रूप से सही वोटर लिस्ट तैयार और मंज़ूर होने तक राज्य विधानसभा चुनाव टालने और कथित अनियमितताओं की जांच के लिए एक स्वतंत्र न्यायिक समिति बनाने की भी मांग की।

    याचिका में कहा गया कि कथित कार्यों के कारण वोटर लिस्ट के मैनेजमेंट से जुड़े "संवैधानिक नियमों का लगातार उल्लंघन" हुआ है, जिससे आर्टिकल 14 के तहत समान व्यवहार के अधिकार और आर्टिकल 326 के तहत वयस्क मताधिकार के जरिए वोट देने के संवैधानिक अधिकार पर असर पड़ा है।

    याचिका के अनुसार, ECI को वोटर लिस्ट से जुड़े अपने काम करते समय व्यावहारिक और लचीला तरीका अपनाना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि देश लोकतांत्रिक तरीके से चले।

    महाराष्ट्र में SIR को अलग याचिका में चुनौती

    इसके अलावा, बॉम्बे हाईकोर्ट की मुख्य पीठ में वकील हितेंद्र गांधी के ज़रिए एक और रिट याचिका दायर की गई, जिसमें महाराष्ट्र में स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (SIR) की संवैधानिक वैधता और उसके लागू होने को चुनौती दी गई।

    मुंबई के दो व्यापारियों की ओर से दायर इस याचिका में SIR प्रक्रिया को रोकने की मांग नहीं की गई। इसके बजाय, इसमें उस आदेश और दर्ज कारणों का खुलासा या उन्हें पेश करने की मांग की गई, जिनके तहत महाराष्ट्र में SIR किया जा रहा है, साथ ही इसके तरीके और कानूनी आधार के बारे में पारदर्शिता की मांग की गई।

    याचिका में कहा गया,

    "याचिकाकर्ता SIR को रोकना या इस कार्यक्रम में बाधा डालना नहीं चाहते हैं। ECI सीमित चुनावी आकलन कर सकता है लेकिन नागरिकता के बारे में पक्के तौर पर तय नहीं कर सकता। जहां संदेह बना रहता है, वहां मामले को नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत सक्षम अधिकारी के पास भेजा जाना चाहिए और चुनावी नतीजा उनके फैसले के अनुसार होना चाहिए।"

    याचिका में योग्य मतदाताओं को गलत तरीके से सूची से हटाने के खिलाफ सुरक्षा और हटाए गए मतदाताओं के नाम वापस जोड़ने की भी मांग की गई।

    इसमें आरोप लगाया गया कि हालांकि ECI के महाराष्ट्र के निर्देशों में गिनती के दौरान दस्तावेज इकट्ठा करने की इजाजत नहीं है, फिर भी बूथ लेवल ऑफिसर गिनती के फॉर्म लेते समय नागरिकों से "सपोर्टिंग डॉक्यूमेंट्स" (सहायक दस्तावेज) देने के लिए कह रहे हैं।

    यह याचिका महाराष्ट्र में SIR को कानूनी रूप से लागू करने से जुड़ी है। याचिकाकर्ता SIR को रोकना या इस कार्यक्रम में बाधा डालना नहीं चाहते हैं। ECI सीमित चुनावी आकलन तो कर सकता है, लेकिन नागरिकता के बारे में पक्के तौर पर फैसला नहीं कर सकता। जहां संदेह बना रहता है, वहां मामले को नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत सक्षम अधिकारी के पास भेजा जाना चाहिए और चुनावी नतीजा उस अधिकारी के फैसले के अनुसार होना चाहिए। मांगी गई सीमित राहत यह है कि उस आदेश और दर्ज कारणों का खुलासा या उन्हें पेश किया जाए जिसके तहत महाराष्ट्र में SIR किया जा रहा है। साथ ही इसकी कार्यप्रणाली और कानूनी आधार के बारे में पारदर्शिता हो और योग्य मतदाताओं को गलत तरीके से हटाने के खिलाफ सुरक्षा उपाय हों।

    इसलिए याचिका में SIR की कार्यप्रणाली और कानूनी आधार के बारे में पारदर्शिता और यह सुनिश्चित करने के लिए सुरक्षा उपायों की मांग की गई है कि योग्य मतदाताओं को गलत तरीके से सूची से न हटाया जाए।

    दोनों याचिकाओं का सोमवार, 28 सितंबर को संबंधित बेंचों के सामने उल्लेख किए जाने की संभावना है।

    Case Title: Prathamesh Gopal Gavankar vs Election Commission of India

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