मंत्री कानूनी प्राधिकरणों को सौंपे गए कार्यों को अपने हाथ में नहीं ले सकते: बॉम्बे हाईकोर्ट ने जमीन का दर्जा बदलने वाले मंत्री का आदेश रद्द किया

  • मंत्री कानूनी प्राधिकरणों को सौंपे गए कार्यों को अपने हाथ में नहीं ले सकते: बॉम्बे हाईकोर्ट ने जमीन का दर्जा बदलने वाले मंत्री का आदेश रद्द किया

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने राज्य के मंत्री का वह आदेश रद्द किया, जिसमें 'देवस्थान इनाम क्लास III' (Devsthan Inam Class III) जमीन को 'क्लास I ओल्ड टेन्योर' (Class I Old Tenure) में बदल दिया गया।

    कोर्ट ने कहा कि कोई मंत्री उन कानूनी कार्यों को अपने अधिकार में नहीं ले सकता, जो कानून के तहत विशेष प्राधिकरणों (Statutory Authorities) को सौंपे गए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार भी किसी कानूनी प्राधिकरण की शक्तियों को अपने हाथ में नहीं ले सकती, और न ही उसे अपने विवेक का इस्तेमाल किसी खास तरीके से करने के लिए मजबूर कर सकती है।

    जस्टिस अमित बोरकर रिट याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें 28 अप्रैल 2014 को राज्य के मंत्री द्वारा 'देवस्थान इनाम' जमीन के संबंध में दिए गए आदेश को चुनौती दी गई। मंत्री ने इस जमीन को 'क्लास III इनाम' से बदलकर 'क्लास I ओल्ड टेन्योर' किया था। साथ ही उन्होंने तहसीलदार को निर्देश दिया कि वे 'बॉम्बे टेनेंसी एंड एग्रीकल्चरल लैंड्स एक्ट, 1948' (BTAL एक्ट) की धारा 32-G और 70-B के तहत कुछ निजी पक्षों (Private Respondents) को इस जमीन का मालिक घोषित करें। इसके अलावा, उन्होंने धारा 43 के तहत जमीन के हस्तांतरण (Transfer) की अनुमति भी दी थी।

    यह जमीन 21 मई 1862 को देवता 'श्री भैरवदेव' को 'क्लास III इनाम' के रूप में दी गई। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो मंत्री को 'देवस्थान इनाम' जमीन को 'क्लास I' जमीन में बदलने, या तहसीलदार को यह निर्देश देने का अधिकार देता हो कि वे निजी पक्षों को BTAL एक्ट के तहत जमीन का मालिक घोषित करें।

    कोर्ट ने 'सुवर्णा अप्पासाहेब क्षीरसागर बनाम महाराष्ट्र राज्य' [(2025) 3 हाईकोर्ट केसेस (बॉम्बे) 39] मामले में अपने पहले के फैसले का हवाला दिया। उस फैसले में कहा गया कि 'एग्जेम्पशन्स फ्रॉम लैंड रेवेन्यू (नंबर 1) एक्ट, 1863' की धारा 8(3) के तहत 'देवस्थान इनाम' जमीन के हस्तांतरण या उसे किसी और को सौंपने पर पूरी तरह से रोक (Absolute Bar) लगाई गई।

    कोर्ट ने कहा था,

    "...राज्य सरकार के पास यह अधिकार नहीं है कि वह 'एग्जेम्पशन्स फ्रॉम लैंड रेवेन्यू (नंबर 1) एक्ट, 1863' की धारा 8(3) के तहत 'देवस्थान इनाम' जमीन के हस्तांतरण पर लगी रोक से कोई छूट दे सके।"

    उपर्युक्त कानूनी स्थिति के आधार पर कोर्ट ने माना कि मंत्री का वह निर्देश, जिसके तहत ज़मीन को 'क्लास III इनाम' से 'क्लास I टेन्योर' (स्वामित्व) में बदला गया, अधिकार क्षेत्र से बाहर था।

    कोर्ट ने कहा,

    "मंत्री ऐसा निर्देश नहीं दे सकते थे। इन प्रावधानों के तहत कोई व्यक्ति किरायेदार या खरीदार घोषित किए जाने का हकदार है या नहीं, यह तय करने की शक्ति BTAL अधिनियम के तहत नियुक्त प्राधिकारी (अथॉरिटी) के पास है।"

    कोर्ट ने आगे कहा कि BTAL Act के तहत अधिकृत प्राधिकारी को तथ्यों और सबूतों की स्वतंत्र रूप से जांच करनी चाहिए। राज्य सरकार न तो खुद इस सवाल पर फैसला ले सकती है और न ही वैधानिक प्राधिकारी को किसी विशेष निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए मजबूर कर सकती है।

    कोर्ट ने टिप्पणी की,

    "मंत्री BTAL Act के तहत आने वाले प्राधिकारी को यह निर्देश नहीं दे सकते थे कि वह अपने वैधानिक विवेक का इस्तेमाल किसी खास तरीके से करे। किसी आवेदन पर विचार करने और अनुमति दी जानी चाहिए या नहीं, यह तय करने की शक्ति अधिनियम के तहत प्राधिकारी के पास है। इस शक्ति का इस्तेमाल उस प्राधिकारी को स्वतंत्र रूप से और कानून के अनुसार करना होता है।"

    चंद्रिका झा बनाम बिहार राज्य [(1984) 2 SCC 41] मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया कि एक मुख्यमंत्री भी उन वैधानिक कार्यों को अपने हाथ में नहीं ले सकते, जो किसी तय प्राधिकारी को सौंपे गए।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हालांकि एक मंत्री कानून द्वारा अनुमत प्रशासनिक या पर्यवेक्षी शक्तियों का इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन इन शक्तियों का मतलब यह नहीं है कि वे उन कार्यों को भी अपने हाथ में ले लें, जो विशेष रूप से किसी वैधानिक प्राधिकारी को सौंपे गए।

    इसके अनुसार, हाईकोर्ट ने मंत्री के विवादित आदेश के खंड 2 से 5 को रद्द किया।

    Case Title: Samasth Gavkari Mandal, Rithe (AOP) v. Krishna Tukaram Teli (Shelkar) [Writ Petition No. 5707 of 2017]

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