नाबालिग रेप पीड़िता का यौन क्रिया को ठीक से न बता पाना उसकी गवाही को खारिज करने का आधार नहीं हो सकता: बॉम्बे हाईकोर्ट ने बरी करने का फैसला पलटा
Shahadat
12 Aug 2026 10:18 AM IST

बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि नाबालिग रेप पीड़िता की गवाही को सिर्फ़ इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह उस यौन क्रिया को ठीक से नहीं बता पाई, जिसका वह शिकार हुई। इसलिए हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया और 2012 के एक मामले में एक नाबालिग लड़की के साथ रेप के लिए एक व्यक्ति को दोषी ठहराया।
औरंगाबाद बेंच में जस्टिस संदीपकुमार मोरे और जस्टिस वैशाली पाटिल-जाधव की डिवीजन बेंच ने गौर किया कि ट्रायल कोर्ट ने 19 अप्रैल, 2017 के अपने फैसले में आरोपी अनिल गायकवाड़ को अपहरण और रेप के मामले से बरी कर दिया था, मुख्य रूप से इस आधार पर कि पीड़िता, जो छह साल की बच्ची थी, उस यौन क्रिया को ठीक से नहीं बता पाई जिसका वह शिकार हुई।
बेंच ने कहा,
"इस मामले में पीड़िता कम उम्र की बच्ची थी, घटना के समय वह 6 साल की थी। इतनी कम उम्र की बच्ची से रेप की घटना को सटीकता से बताने की उम्मीद नहीं की जा सकती। यौन उत्पीड़न की शिकार बच्ची अक्सर सदमे में होती है और यौन क्रिया की डिटेल बताने में असमर्थ होती है। नाबालिग पीड़िता का यौन क्रिया को साफ शब्दों में न बता पाना उसकी गवाही को खारिज करने का आधार नहीं हो सकता, खासकर कम उम्र के कारण जब वह इसे समझने में सक्षम नहीं होती है।"
10 अगस्त के फैसले में, जिसे जस्टिस पाटिल-जाधव ने लिखा, कोर्ट ने गौर किया कि ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता को बाल गवाह माना और 4 मई, 2012 को सवाल-जवाब के रूप में उसकी गवाही दर्ज की गई और 12 फरवरी, 2017 को उसका मुख्य परीक्षण (एग्जामिनेशन-इन-चीफ) किया गया। जजों ने गौर किया कि लगभग पांच साल बीत जाने के बाद भी पीड़िता ने साफ तौर पर बताया कि वह अपनी भाभी के घर पर टीवी देख रही थी और आरोपी, जिसे 'अन्या' कहा जाता था, वहां आया और उसे अपने साथ आटा चक्की तक चलने के लिए कहा।
इसके अलावा, नाबालिग लड़की ने गवाही दी कि उसके बाद आरोपी ने उसकी आँखें बांध दीं और उसे उठाकर बांध की ओर ले गया और उसकी चड्डी (अंडरगारमेंट) उतार दी और उसके ऊपर बैठ गया। उसने यह भी बताया कि आरोपी ने उसे थप्पड़ मारा। उसने उस आरोपी की भी पहचान की जिसे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए पेश किया गया और बताया कि घटना के बाद उसे अपने 'ओटी' (गर्भाशय) में बहुत दर्द हुआ था।
जजों ने कहा,
"उसकी जिरह (Cross-Examination) अडिग रही है। उसके मुख्य बयान और जिरह को देखने से पता चलता है कि पीड़िता घटना के साढ़े चार साल बाद भी अपने बयान पर कायम है। किसी बच्चे की गवाही को हल्के में नहीं लिया जा सकता। अपनी गवाही में वह खास तौर पर आरोपी का नाम लेती है और घटना का वर्णन अपनी समझ के अनुसार करती है। इतनी कम उम्र के बच्चे से आरोपी को झूठा फंसाने के किसी मकसद की उम्मीद नहीं की जा सकती। बच्चे की गवाही को वयस्क गवाह की गवाही वाले पैमानों पर नहीं परखा जाना चाहिए।"
यह घटना 3 मई 2012 की, जो सख्त POCSO Act लागू होने से भी पहले की बात है। पीड़िता इमली के पेड़ के नीचे बेहोश मिली थी और उसकी माँ व परिवार के अन्य सदस्यों ने उसे वहां पड़ा देखा, उसके प्राइवेट पार्ट से खून बह रहा था। होश में आने पर उसने अपने माता-पिता को बताया कि कैसे 'अन्या' उसे वहां ले गई और उसी के आधार पर आरोपी के खिलाफ FIR दर्ज की गई। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को बरी कर दिया था।
लेकिन हाईकोर्ट की बेंच, जो राज्य द्वारा दायर अपील पर विचार कर रही थी, ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया और आरोपी को अपहरण और रेप का दोषी ठहराया।
बेंच ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए यह टिप्पणी की,
"हमारी सोच यह है कि ट्रायल कोर्ट का फैसला रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों की गलत व्याख्या को दर्शाता है। ट्रायल कोर्ट पीड़िता की गवाही की विश्वसनीयता और भरोसेमंदता को समझने में नाकाम रहा है। उसने छोटी-मोटी विसंगतियों को बहुत ज़्यादा महत्व दिया है, जो अभियोजन पक्ष के मामले के लिए घातक नहीं हैं। ट्रायल कोर्ट का नज़रिया गलत है और दर्ज किए गए निष्कर्ष रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के विपरीत हैं।"
सज़ा सुनाते हुए बेंच ने ध्यान दिया कि ट्रायल के दौरान आरोपी पहले ही पाँच साल जेल में बिता चुका है और घटना के समय वह 22 साल का था, जबकि आज वह 36 साल का है। बेंच ने यह भी नोट किया कि इस दौरान आरोपी की शादी हो चुकी है और पीड़िता ने भी किसी और से शादी कर ली है और अपनी ज़िंदगी में बस गई है।
जजों ने अपनी राय दी,
"इसे देखते हुए हालाँकि IPC की धारा 376 में उम्रकैद तक की सज़ा का प्रावधान है, लेकिन हमारी राय है कि घटना के समय धारा 376 के तहत बताई गई कम-से-कम सात साल की सज़ा और कुछ जुर्माना उस पर लगाया जा सकता है। हमने पीड़िता को मुआवज़ा देने के सवाल पर भी विचार किया। हालांकि, हम ऐसा करने से बच रहे हैं, क्योंकि पीड़िता, जो 2012 में घटना के समय सिर्फ़ 6 साल की थी, अब लगभग 20 साल की है। उसकी शादी हो चुकी है और वह दो बच्चों के साथ अपनी ज़िंदगी में बस चुकी है। मुआवज़े के लिए कोर्ट जाने की किसी भी ज़रूरत से उसे अपने बचपन की उस दर्दनाक घटना को फिर से याद करना पड़ेगा, जिससे उसकी अभी की बसी-बसाई ज़िंदगी में खलल पड़ेगा, और हम ऐसा नहीं चाहते।"
इसलिए बेंच ने आरोपी को आदेश दिया कि वह अपनी बाकी बची लगभग दो साल की सज़ा काटने के लिए पुलिस के सामने सरेंडर करे।
Case Title: State of Maharashtra vs Anil Shridhar Gaikwad (Criminal Appeal 993 of 2019)


