शादीशुदा ज़िंदगी में सिर्फ़ नाराज़गी या चिड़चिड़ापन क्रूरता नहीं है: बॉम्बे हाईकोर्ट ने पति को तलाक़ देने से इनकार किया
Shahadat
21 Aug 2026 10:27 AM IST

बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में एक पति की अपील खारिज करते हुए कहा कि पति-पत्नी के बीच सिर्फ़ नाराज़गी या चिड़चिड़ापन क्रूरता नहीं माना जाएगा और हिंदू मैरिज एक्ट के तहत तलाक़ का आधार नहीं हो सकता। पति ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ अपील की थी जिसमें क्रूरता के आधार पर शादी खत्म करने की उसकी अर्ज़ी खारिज की गई।
जस्टिस उर्मिला जोशी-फाल्के और जस्टिस राज वाकोडे की डिवीज़न बेंच ने कहा कि छोटी-मोटी बातों पर क्रूरता के आरोपों पर विचार नहीं किया जा सकता और आरोपों में क्रूरता के समय, जगह और तरीके का ज़िक्र होना चाहिए।
जजों ने कहा,
"कानून की नज़र में क्रूरता के सामान्य आरोप शादी खत्म करने का आदेश देने के लिए क्रूरता नहीं माने जाते। सिर्फ़ नाराज़गी या चिड़चिड़ापन क्रूरता नहीं हो सकता; बल्कि यह इंसानी व्यवहार में अचानक आया बदलाव है जो दूसरे पक्ष को जीवन या शारीरिक चोट के खतरे के डर से जीवनसाथी के साथ रहने से रोकता है। हालांकि, 'क्रूरता' शब्द को सख्ती से परिभाषित नहीं किया गया, लेकिन इसे हर मामले की परिस्थितियों से समझा जाना चाहिए। आरोप में ऐसी क्रूरता करने के समय, जगह और तरीके के बारे में स्पष्ट जानकारी होनी चाहिए। क्रूरता ऐसी होनी चाहिए जिसमें साथ रहना उचित रूप से संभव न हो।"
बेंच एक पति द्वारा दायर फैमिली कोर्ट अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें फैमिली कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई, जिसमें क्रूरता के आधार पर तलाक़ की पति की अर्ज़ी खारिज की गई।
बेंच ने गौर किया कि पति ने दावा किया कि उसे अपनी पत्नी द्वारा कई आधारों पर मानसिक क्रूरता का शिकार बनाया गया, जैसे कि उसकी बूढ़ी माँ से झगड़ा करना, माँ की देखभाल न करना, शादी के 10 साल बाद भी बच्चा न होने के लिए उसे दोषी ठहराना, और लगातार उसे अपने बूढ़े माता-पिता को छोड़कर नागपुर शिफ्ट होने के लिए मजबूर करना। कोर्ट ने यह भी कहा कि पति ने पत्नी को उसके मायके से वापस लाने की कोशिश की, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद वह वापस नहीं आई। इसके बजाय, उसने पति और उसके परिवार पर घरेलू हिंसा वगैरह के झूठे आरोप लगाते हुए पुलिस में FIR दर्ज कराई।
हालांकि, बेंच ने पति से हुई पूछताछ (क्रॉस-एग्जामिनेशन) से पाया कि वह अपने आरोपों को साबित नहीं कर सका। इसके विपरीत, रिकॉर्ड पर आए सबूतों से पता चला कि पत्नी 2012 में अपने भाई की शादी में गई और लौटने पर उसे ससुराल में घुसने नहीं दिया गया। उसने साथ रहने की कई कोशिशें कीं, लेकिन पति ने उसके साथ बुरा बर्ताव किया और उसे घर में नहीं घुसने दिया। फिर उसने पुलिस में शिकायत की। पुलिस के सामने पति ने उसका खर्च उठाने और साथ रहने की बात मानी, लेकिन बाद में वह अपनी बात से मुकर गया और उसे घर में आने की इजाज़त देने से इनकार किया।
इसलिए बेंच ने माना कि पति का व्यवहार ही पत्नी के साथ क्रूरतापूर्ण है, क्योंकि उसने पत्नी की कोशिशों के बावजूद उसे ससुराल में घुसने और साथ रहने नहीं दिया। कोर्ट ने पाया कि जब पति ऑफिस जाता है तो पत्नी ही उसके माता-पिता की देखभाल करती है और आर्थिक व नैतिक रूप से उसका साथ भी देती है।
बेंच ने कहा,
"रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों से पता चलता है कि अपील करने वाले (पति) के व्यवहार के कारण ही प्रतिवादी (पत्नी) को ससुराल छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। अपील करने वाले ने जिस तरह की क्रूरता का सामना करने का दावा किया, वह साबित नहीं हो पाया है। जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है, सिर्फ़ नाराज़गी, चिड़चिड़ाहट या रोज़मर्रा की छोटी-मोटी अनबन को क्रूरता नहीं माना जा सकता। क्रूरता ऐसी होनी चाहिए, जिससे यह उम्मीद न की जा सके कि जोड़ा साथ रह सकता है; इस मामले में ऐसी कोई बात नहीं है। अपील करने वाले/पति के आरोप साबित नहीं हुए, इसलिए फैमिली कोर्ट ने सही माना है कि अपील करने वाले की तरफ़ से क्रूरता का आधार साबित नहीं हो पाया।"
इन बातों को ध्यान में रखते हुए बेंच ने क्रूरता के आधार पर तलाक न देने के फैमिली कोर्ट के आदेश को सही ठहराया और पति को पत्नी को हर महीने 5,000 रुपये का गुज़ारा-भत्ता (मेंटेनेंस) देने का निर्देश भी बरकरार रखा।
Case Title: VHC vs MVC (Family Court Appeal 14 of 2016)


