मराठा कोटा पर चुनौती: बॉम्बे हाईकोर्ट ने 3 जजों की नई बेंच बनाई, 9 अक्टूबर से फिर से शुरू होगी सुनवाई

  • मराठा कोटा पर चुनौती: बॉम्बे हाईकोर्ट ने 3 जजों की नई बेंच बनाई, 9 अक्टूबर से फिर से शुरू होगी सुनवाई

    बॉम्बे हाईकोर्ट की तीन जजों की नई बेंच 'महाराष्ट्र राज्य सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग आरक्षण अधिनियम, 2024' की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फिर से सुनवाई शुरू करेगी। यह कानून राज्य में शिक्षा और सरकारी नौकरियों में मराठा समुदाय को 10% आरक्षण देता है।

    इस नई फुल-बेंच (पूर्ण पीठ) की अध्यक्षता जस्टिस मकरंद कार्निक करेंगे। बेंच के अन्य सदस्यों में जस्टिस निजामुद्दीन जमादार और जस्टिस संदीप मारणे होंगे। बता दें, यह तीसरी बेंच होगी, जो इस मामले में दलीलों पर सुनवाई शुरू करेगी, क्योंकि इससे पहले की दो फुल-बेंच सुनवाई पूरी नहीं कर पाई थीं।

    गौरतलब है कि मराठा आरक्षण के पक्ष और विरोध में दायर याचिकाओं पर पहले (तत्कालीन) चीफ जस्टिस देवेंद्र उपाध्याय, जस्टिस गिरीश कुलकर्णी और जस्टिस फिरदोस पूनीवाला की फुल-बेंच सुनवाई कर रही थी। हालांकि, चीफ जस्टिस उपाध्याय के दिल्ली हाईकोर्ट में ट्रांसफर होने के कारण, वह फुल-बेंच अब उन याचिकाओं पर सुनवाई नहीं कर सकती थी।

    इसलिए जस्टिस रवींद्र घुगे की अध्यक्षता में एक नई फुल-बेंच बनाई गई, जिसने मई 2025 से इस साल अगस्त तक मामले पर काफी हद तक सुनवाई की। हालांकि, जस्टिस घुगे को भी कलकत्ता हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बना दिया गया और मामला आगे नहीं बढ़ सका।

    इसलिए अब जस्टिस कार्निक की अध्यक्षता में एक नई बेंच बनाई गई, जिसने शुक्रवार को स्पष्ट किया कि वह 9 अक्टूबर से इस मामले में फिर से सुनवाई शुरू करेगी।

    मराठा आरक्षण कोटा क्या है?

    इस कानून को विधानसभा ने 20 फरवरी, 2024 को पारित किया और राज्य सरकार ने जस्टिस (रिटायर्ड) सुनील बी. शुक्रे की अध्यक्षता वाले महाराष्ट्र राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग (MSBCC) की रिपोर्ट के आधार पर 26 फरवरी, 2024 को इसे अधिसूचित किया। रिपोर्ट में मराठा समुदाय को आरक्षण देने के लिए "असाधारण परिस्थितियों और हालात" का हवाला दिया गया, जिससे कुल आरक्षण की 50% की सीमा पार हो गई। एक वकील ने पहले बॉम्बे हाईकोर्ट में 2018 में देवेंद्र फडणवीस की सरकार द्वारा बनाए गए 'महाराष्ट्र राज्य सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBC) के लिए आरक्षण अधिनियम, 2018' को चुनौती दी। इस कानून के तहत मराठा समुदाय को सरकारी नौकरियों और शिक्षा में 16% आरक्षण दिया गया।

    हालांकि, बॉम्बे हाईकोर्ट ने जून 2019 में 2018 के कानून को सही ठहराया, लेकिन उसने 16% कोटे को अनुचित माना और इसे घटाकर शिक्षा में 12% और सरकारी नौकरियों में 13% कर दिया। पाटिल और अन्य लोगों ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

    मई 2021 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने SEBC Act, 2018 को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि मराठा समुदाय के लिए अलग आरक्षण को सही ठहराने वाली कोई असाधारण परिस्थितियां नहीं थीं, और यह आरक्षण 1992 के इंदिरा साहनी (मंडल) फैसले में तय की गई 50% की अधिकतम सीमा से अधिक है। सुप्रीम कोर्ट ने मराठा समुदाय के सामाजिक रूप से पिछड़े होने को साबित करने के लिए पेश किए गए आंकड़ों (Empirical Data) पर भी सवाल उठाए।

    महाराष्ट्र सरकार ने एक समीक्षा याचिका (Review Petition) दायर की, जिसे अप्रैल 2023 में खारिज कर दिया गया। इसके बाद एक उपचारात्मक याचिका (Curative Petition) दायर की गई, जो अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

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