महाराष्ट्र के धर्म-परिवर्तन विरोधी कानून को हाईकोर्ट में चुनौती, धार्मिक स्वतंत्रता और निजता के उल्लंघन का आरोप
Shahadat
12 Sept 2026 9:35 AM IST

बॉम्बे हाईकोर्ट में महाराष्ट्र धर्म की स्वतंत्रता (MFR) अधिनियम, 2026 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए याचिका दायर की गई। इसमें तर्क दिया गया कि यह कानून, जिसे 'धर्म-परिवर्तन विरोधी' कानून बताया जा रहा है, नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
यह याचिका मौलाना हलीमुल्लाह फारूक अहमद खान ने वकील अब्दुल मतीन शेख के माध्यम से MFR Act की वैधता को चुनौती देते हुए दायर की।
उन्होंने तर्क दिया कि कानून के कई प्रावधान, विशेष रूप से धारा 2(a), 3, 6, 7 और 9, भारत के संविधान के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। इन अधिकारों में अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 19(1)(a) (भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), 19(1)(c) (संघ बनाने की स्वतंत्रता), 21 (जीवन का अधिकार), 25 (धर्म की स्वतंत्रता), 26 (धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार) और 29 (अल्पसंख्यकों के अधिकारों का संरक्षण) शामिल हैं।
याचिका में कहा गया,
"हालांकि राज्य बल, धोखाधड़ी, दबाव या अन्य तरीकों से किए जाने वाले धर्म-परिवर्तन को रोकने के लिए उचित उपाय कर सकता है - जो स्वतंत्र और सोच-समझकर दी गई सहमति को प्रभावित करते हैं - लेकिन यह कानून उस स्वीकार्य उद्देश्य से आगे निकल जाता है। इसके प्रावधान अस्पष्ट, बहुत व्यापक और असंगत हैं, नतीजतन अंतरात्मा की स्वतंत्रता, धार्मिक पसंद, भाषण, संगठन, निजता और व्यक्तिगत स्वायत्तता पर अनुचित प्रतिबंध लगाते हैं।"
याचिका में बताया गया कि MFR Act की धारा 2(a) में "प्रलोभन" (Allurement) शब्द को परिभाषित किया गया, जिसमें "बेहतर जीवनशैली" और "दैवीय उपचार" (Divine Healing) जैसे व्यापक और व्यक्तिपरक शब्दों का इस्तेमाल किया गया।
याचिका में कहा गया,
"इस प्रावधान का दायरा इतना व्यापक है कि यह वैध धार्मिक चर्चा, प्रचार, धर्मार्थ गतिविधियों और शैक्षिक सहायता को भी दंडनीय परिणामों के दायरे में ला सकता है। इससे संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a), 19(1)(c), 25 और 26 के तहत गारंटीकृत स्वतंत्रता पर नकारात्मक प्रभाव (Chilling Effect) पड़ सकता है।"
याचिका में कहा गया कि इस कानून के कुछ प्रावधानों के तहत, बिना किसी ज़बरदस्ती, धोखाधड़ी या दबाव के किए गए स्वेच्छा से धार्मिक कार्यों और धर्म परिवर्तन को भी आपराधिक दायरा में लाया जा सकता है। इसमें यह भी कहा गया कि ऐसी व्याख्या अनुच्छेद 25 के तहत गारंटीकृत अंतरात्मा की स्वतंत्रता में अनुचित हस्तक्षेप करती है, जो किसी सक्षम व्यक्ति को आस्था और विश्वास के मामलों में सोच-समझकर और स्वेच्छा से निर्णय लेने के अधिकार की रक्षा करती है।
याचिका में आगे कहा गया,
"धारा 6 और 7, धर्म परिवर्तन के इरादे की पहले से जानकारी देने की आवश्यकता और राज्य के अधिकारियों द्वारा ऐसी व्यक्तिगत पसंद की जांच-पड़ताल के माध्यम से, किसी व्यक्ति की निजता, गरिमा और निर्णय लेने की स्वतंत्रता में दखल देती हैं। किसी आस्था को बनाए रखने, बदलने या अपनाने की पसंद व्यक्ति की अंतरात्मा और पहचान से गहराई से जुड़ी होती है। इसलिए पहले से सूचना देने और राज्य द्वारा जांच की एक सामान्य व्यवस्था अनुचित प्रतिबंध लगाती है, खासकर तब जब ज़बरदस्ती, धोखाधड़ी या दबाव से जुड़े मामलों को कम प्रतिबंधात्मक उपायों से भी हल किया जा सकता है। धारा 9, विवादित कानूनी ढांचे के उल्लंघन के लिए गंभीर दंड का प्रावधान करके, संवैधानिक खामी को और बढ़ा देती है। अस्पष्ट और बहुत व्यापक प्रावधानों के माध्यम से विनियमित आचरण पर आपराधिक दायरा थोपना मनमाने ढंग से लागू करने का जोखिम पैदा करता है और मौलिक स्वतंत्रता के प्रयोग पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।"
याचिकाकर्ता के अनुसार, विवादित प्रावधानों का कुल मिलाकर असर यह है कि ये अधिकारियों को अत्यधिक और अनियंत्रित विवेकाधिकार देते हैं, जिसके परिणामस्वरूप अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करते हुए मनमाना प्रयोग होता है; अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(c) के तहत संरक्षित धार्मिक भाषण और संगठन की स्वतंत्रता को सीमित करते हैं; अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित निजता, गरिमा और निर्णय लेने की स्वतंत्रता में दखल देते हैं; और अनुच्छेद 25, 26 और 29 के तहत अंतरात्मा की स्वतंत्रता और धार्मिक संप्रदायों व अल्पसंख्यकों के अधिकारों में अनुचित हस्तक्षेप करते हैं।
इन तर्कों के साथ याचिका में यह घोषणा करने की मांग की गई कि MFR Act, विशेष रूप से इसकी धाराएं 2(a), 3, 6, 7 और 9, असंवैधानिक और शून्य हैं, क्योंकि वे भारत के संविधान के भाग III के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती हैं। वैकल्पिक रूप से, याचिका अदालत से आग्रह करती है कि वह उक्त प्रावधानों की व्याख्या इस तरह करे कि उनका प्रयोग केवल उन मामलों तक सीमित रहे जिनमें वास्तविक ज़बरदस्ती, धोखाधड़ी, दबाव या अन्य ऐसे तरीकों से धर्म परिवर्तन किया गया हो, जो स्पष्ट रूप से स्वतंत्र और सोच-समझकर दी गई सहमति को दूषित करते हों। इस याचिका के आने वाले हफ़्ते में हाई कोर्ट के सामने सूचीबद्ध होने की संभावना है।
Case Title: Maulana Halimullah Farooque Ahemed Khan vs State of Maharashtra


