आरोप बदलने के बाद गवाहों को दोबारा बुलाने की अर्जी सुनने से इनकार, निष्पक्ष सुनवाई के खिलाफ: मद्रास हाईकोर्ट

Praveen Mishra

15 July 2026 5:28 PM IST

  • आरोप बदलने के बाद गवाहों को दोबारा बुलाने की अर्जी सुनने से इनकार, निष्पक्ष सुनवाई के खिलाफ: मद्रास हाईकोर्ट

    मद्रास हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि ट्रायल के दौरान आरोप (Charges) में बदलाव किया जाता है, तो आरोपी को पहले से जांचे जा चुके गवाहों को दोबारा बुलाकर उनसे जिरह करने का अवसर देना निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) का अहम हिस्सा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 217 सीआरपीसी के तहत दायर ऐसी अर्जी को सुनने से ही इनकार करना प्रक्रियागत निष्पक्षता (Procedural Fairness) के मूल सिद्धांत के विपरीत होगा।

    जस्टिस विक्टोरिया गौरी ने कहा कि धारा 217 सीआरपीसी अदालत को यह विवेकाधिकार जरूर देती है कि यदि गवाहों को दोबारा बुलाने की मांग केवल मुकदमे में देरी या उत्पीड़न के उद्देश्य से की गई हो, तो उसे खारिज किया जा सकता है। लेकिन यह विवेकाधिकार न्यायिक तरीके से प्रयोग होना चाहिए, न कि यांत्रिक ढंग से। अदालत ने कहा कि पहले आवेदन को स्वीकार कर उसे क्रमांकित (Number) किया जाना चाहिए और फिर उसके गुण-दोष के आधार पर फैसला किया जाना चाहिए।

    मामला रमेश उर्फ कविया रमेश से जुड़ा है, जिस पर हत्या के एक मामले में मुख्य आरोपियों की मदद करने का आरोप है। ट्रायल के दौरान अधिकांश गवाहों के बयान दर्ज होने के बाद अदालत ने उसके खिलाफ धारा 302/34 और 302/120B आईपीसी के तहत नए आरोप जोड़ दिए। इसके बाद आरोपी ने धारा 217 सीआरपीसी के तहत गवाहों को दोबारा बुलाने की अर्जी दाखिल की, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने उसे स्वीकार ही नहीं किया।

    हाईकोर्ट ने कहा कि जब ट्रायल के दौरान आरोपों में महत्वपूर्ण बदलाव किया जाता है, तो अभियोजन और बचाव—दोनों पक्षों को पहले से जांचे जा चुके गवाहों को दोबारा बुलाने और आवश्यक अतिरिक्त साक्ष्य पेश करने का अवसर दिया जाना चाहिए। क्योंकि जिरह की रणनीति आरोपों की प्रकृति पर निर्भर करती है और आरोप बदलने पर बचाव पक्ष को अपना पक्ष प्रभावी ढंग से रखने का उचित अवसर मिलना चाहिए।

    हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल आरोप बदल जाने से हर मामले में नए सिरे से ट्रायल (De Novo Trial) आवश्यक नहीं हो जाता। साथ ही, ट्रायल जज के खिलाफ पक्षपात के आरोपों के आधार पर मुकदमा दूसरे न्यायालय में स्थानांतरित करने की मांग भी हाईकोर्ट ने खारिज कर दी।

    अंत में हाईकोर्ट ने आरोपी को धारा 217 सीआरपीसी के तहत अपनी अर्जी आगे बढ़ाने की अनुमति दी और निर्देश दिया कि ट्रायल कोर्ट पहले उस अर्जी का गुण-दोष के आधार पर निर्णय करे, उसके बाद ही आगे की कार्यवाही जारी रखे।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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