अधिग्रहित ज़मीन से जुड़े दूध के कारोबार के नुकसान पर मुआवज़ा मिल सकता है: बॉम्बे हाईकोर्ट

Shahadat

15 Sept 2026 6:05 PM IST

  • अधिग्रहित ज़मीन से जुड़े दूध के कारोबार के नुकसान पर मुआवज़ा मिल सकता है: बॉम्बे हाईकोर्ट

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि अधिग्रहित ज़मीन पर बने अस्तबल से चलाए जा रहे दूध के कारोबार में हुए नुकसान के लिए मुआवज़ा मिल सकता है, क्योंकि लैंड एक्विजिशन एक्ट, 1894 की धारा 3(a) के तहत "ज़मीन" में ज़मीन से मिलने वाले फ़ायदे भी शामिल हैं। कोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता ने अपने दूध के कारोबार के बारे में सबूत पेश किए और यह कारोबार ज़मीन के अधिग्रहण के कारण ही बंद हुआ था।

    जस्टिस अभय आहूजा उस अपील पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें अधिग्रहित ज़मीन और मवेशियों के शेड के लिए मुआवज़ा बढ़ाने की मांग की गई। संबंधित ज़मीन का अधिग्रहण लैंड एक्विजिशन एक्ट, 1894 की धारा 4 और 6 के तहत जारी नोटिफ़िकेशन के आधार पर किया गया। आख़िरकार 19 जनवरी, 2000 को कब्ज़ा ले लिया गया। अपीलकर्ता ने शुरू में एक्ट की धारा 18 के तहत रेफ़रेंस के ज़रिए मुआवज़ा बढ़ाने की मांग की थी। बाद में उसने दूध के कारोबार में हुए नुकसान के लिए भी मुआवज़े का दावा किया।

    अपीलकर्ता ने एक खाता-बही पेश की जिसमें उन लोगों के नाम दर्ज है, जिन्हें दूध बेचा गया, दूध की दर और चारे पर हुए खर्च के साथ-साथ भैंसों की खरीद, मज़दूरों के भुगतान और दवाओं से जुड़ी एंट्रीज़ भी थीं। उसने दूध के कारोबार में हुए नुकसान के बारे में ज़बानी गवाही भी दी।

    कोर्ट ने 'अंब्या कल्याण म्हात्रे बनाम महाराष्ट्र राज्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का हवाला देते हुए कहा कि जब कोई ज़मीन मालिक मुआवज़े की रक़म पर आपत्ति जताते हुए रेफ़रेंस की मांग करता है, तो मुआवज़े का पूरा मामला रेफ़रेंस कोर्ट के सामने खुला होता है।

    कोर्ट ने कहा,

    "एक्ट की धारा 18 में बताई गई समय-सीमा खत्म होने के बाद आपत्तियों का स्वरूप एक श्रेणी से दूसरी श्रेणी में बदलना मंज़ूर नहीं है... मुआवज़े की रक़म पर आपत्ति के मामले में ज़मीन मालिक समय-सीमा खत्म होने के बाद अपने दावे को माप या बंटवारे पर आपत्ति में बदलने के लिए संशोधन की मांग नहीं कर सकता।"

    कोर्ट ने माना कि अपीलकर्ता ने अपनी आपत्ति का स्वरूप नहीं बदला, जो मुआवज़ा बढ़ाने की मांग ही बनी रही। कोर्ट ने कहा कि जिस ज़मीन मालिक की ज़मीन चली गई, उसे ज़मीन की असली बाज़ार कीमत मिलनी चाहिए। उसे तकनीकी कारणों से उस अस्थायी रक़म तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, जिसका ज़िक्र उसने रेफ़रेंस मांगते समय किया। ज़मीन अधिग्रहण अधिनियम की धारा 3(a) का ज़िक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि "ज़मीन" में ज़मीन से मिलने वाले फ़ायदे भी शामिल हैं।

    कोर्ट ने कहा,

    "ज़िला जज को रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री, ख़ासकर मौखिक और दस्तावेज़ी सबूतों पर विचार करने के बाद दूध के कारोबार के नुकसान के लिए बढ़ा हुआ मुआवज़ा देना चाहिए। हालांकि, दूध के कारोबार के नुकसान के लिए बढ़ा हुआ मुआवज़ा न मिलने के कारण अपीलकर्ता को आर्थिक नुकसान हुआ।"

    इसके अनुसार, कोर्ट ने अवार्ड में बदलाव किया और प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि वे अपीलकर्ता को दूध के कारोबार के नुकसान के लिए उसकी संशोधन अर्ज़ी में दिए गए हिसाब के अनुसार मुआवज़ा दें।

    Case Title: Kashinath Dudhaji Gaikwad v. The State of Maharashtra [First Appeal No. 20 of 2012]

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