ससुर ने पति के अफेयर में दखल देने से मना किया, पत्नी को घरेलू हिंसा 'बर्दाश्त' करने की सलाह देना IPC की धारा 498A के तहत क्रूरता नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट

Shahadat

6 Jan 2026 9:34 AM IST

  • ससुर ने पति के अफेयर में दखल देने से मना किया, पत्नी को घरेलू हिंसा बर्दाश्त करने की सलाह देना IPC की धारा 498A के तहत क्रूरता नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में फैसला सुनाया कि एक महिला के ससुर का उसके पति के 'शादी के बाहर के अफेयर' की शिकायत सुनने से मना करना और उसके देवर (पति का भाई) का उसे पति की पिटाई 'बर्दाश्त' करने के लिए कहना, इंडियन पैनल कोड (IPC) की धारा 498A के तहत क्रूरता नहीं माना जाएगा।

    जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस श्याम चंदक की डिवीजन बेंच ने यह फैसला एक आदमी और उसके छोटे बेटे के खिलाफ उसकी बहू की शिकायत पर पुणे पुलिस में दर्ज FIR रद्द करते हुए सुनाया।

    9 दिसंबर, 2025 के अपने फैसले में जजों ने कहा कि शिकायतकर्ता महिला ने अपनी FIR में आरोप लगाया था कि उसके ससुर और देवर (याचिकाकर्ता) ने उसके पति का दिमाग 'खराब' कर दिया था, जिसकी वजह से वह अक्सर उसे पीटता और टॉर्चर करता था। जब उसे पति के अफेयर के बारे में पता चला और उसने इस बारे में ससुर से शिकायत की तो कथित तौर पर उन्होंने उसकी बात सुनने से मना कर दिया और जवाब दिया कि 'वह पति को परेशान कर रही होगी' और कम दहेज को लेकर भी नाराजगी जताई।

    जजों ने कहा,

    "जहां तक ​​याचिकाकर्ता-देवर का सवाल है, आरोप है कि उसने उसे पति की पिटाई बर्दाश्त करने के लिए ताना मारा। जब इन आरोपों को IPC की धारा 498A के तहत देखा जाता है तो वे उस प्रावधान के साथ दिए गए स्पष्टीकरण में परिभाषित 'क्रूरता' नहीं बनते हैं।"

    जस्टिस चंदक द्वारा लिखे गए फैसले में वैवाहिक विवादों में ऐसे आपराधिक मुकदमों के 'परिणामों' पर जोर दिया गया, जिसमें पत्नी अक्सर पति के रिश्तेदारों को घसीट लेती है। ऐसे मुकदमों में फंसे रिश्तेदारों की 'इज्जत और चरित्र' की रक्षा करने के लिए अदालतों की जरूरत पर भी जोर दिया गया।

    फैसले में कहा गया,

    "बिना किसी आधार के आपराधिक आरोप और लंबे समय तक चलने वाली आपराधिक कार्यवाही के हमेशा गंभीर परिणाम होते हैं। ऐसे मुकदमों में फंसा व्यक्ति न सिर्फ मानसिक आघात और अपमान झेलता है, बल्कि उसे आर्थिक नुकसान भी होता है। यह आम अनुभव है कि लापरवाही से लगाए गए आरोपों का किसी के करियर की प्रगति और भविष्य की योजनाओं पर गंभीर असर पड़ सकता है। इसके अलावा, यह प्रतिष्ठा पर धब्बा लगाता है, बदनामी लाता है। दोस्तों, परिवार और सहकर्मियों के बीच व्यक्ति की छवि खराब करता है। इसलिए ऐसे मामलों में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 528 और संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करना ज़रूरी है ताकि उन रिश्तेदारों के चरित्र और प्रतिष्ठा की रक्षा की जा सके जिन्हें धारा 498A IPC के मामले में बेवजह फंसाया गया।"

    इसके अलावा, जजों ने राय दी कि इस मामले में शिकायतकर्ता ने मुख्य रूप से अपने पति के साथ निजी विवाद के कारण FIR दर्ज कराई थी।

    बेंच ने आदेश दिया,

    "हालांकि, याचिकाकर्ता पति के रिश्तेदार होने के कारण उसने उन्हें गलत इरादे से FIR में फंसाया। इसलिए FIR और याचिकाकर्ताओं के खिलाफ चार्जशीट जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।"

    इन टिप्पणियों के साथ जजों ने FIR रद्द कर दी।

    Case Title: Amrik Singh Saini vs State of Maharashtra (Writ Petition 4833 of 2024)

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