POSH Act के तहत एम्प्लॉयर अपनी खुद की अपीलीय अथॉरिटी नहीं बना सकता: बॉम्बे हाईकोर्ट
Shahadat
21 Aug 2026 10:44 AM IST

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि POSH Act की धारा 18 और POSH नियमों के नियम 11 को मिलाकर पढ़ने पर एम्प्लॉयर को अपीलीय अथॉरिटी बनाने या गठित करने का कोई अधिकार या अधिकार-क्षेत्र नहीं मिलता है। कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि सरकारी संस्थानों को नियमों की व्याख्या करते समय सावधान रहना चाहिए, क्योंकि गलत व्याख्या से अव्यवस्था फैल सकती है।
जस्टिस जी. एस. कुलकर्णी और जस्टिस डॉ. नीला गोखले की डिवीजन बेंच अशोक उपाध्याय की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। उन्होंने 'कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013' (POSH Act) के तहत कार्यवाही के बाद यूनियन बैंक ऑफ इंडिया द्वारा उन पर लगाए गए जुर्माने को चुनौती दी।
याचिकाकर्ता को शुरू में आंतरिक शिकायत समिति ने दोषमुक्त किया, जिसके खिलाफ शिकायतकर्ता ने अपीलीय अथॉरिटी के समक्ष अपील की थी। याचिकाकर्ता का आरोप था कि अथॉरिटी ने उसे बिना कोई नोटिस दिए या सुनवाई का मौका दिए बिना दोबारा जांच का आदेश दिया। दूसरी समिति ने याचिकाकर्ता को दोषी ठहराया। इसलिए याचिकाकर्ता पर वह जुर्माना लगाया गया जिसे चुनौती दी गई।
कोर्ट ने गौर किया कि धारा 18 में लागू सेवा नियमों के अनुसार "कोर्ट या ट्रिब्यूनल" में अपील करने का प्रावधान है, जहां ऐसे कोई सेवा नियम नहीं हैं, वहां निर्धारित तरीके से अपील की जा सकती है। कोर्ट ने देखा कि नियम 11 के अनुसार, पीड़ित व्यक्ति 'औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946' की धारा 2 के खंड (a) के तहत अधिसूचित अपीलीय अथॉरिटी के समक्ष अपील कर सकता है।
धारा 18 और नियम 11 को मिलाकर पढ़ने पर कोर्ट ने कहा:
"धारा 18 और नियम 11 को मिलाकर पढ़ने पर एम्प्लॉयर को अपीलीय अथॉरिटी बनाने या गठित करने का कोई अधिकार या अधिकार-क्षेत्र नहीं मिलता। यदि इन प्रावधानों को इस तरह पढ़ा जाता है तो यह प्रावधानों को विफल करने जैसा होगा और साथ ही प्रावधान में ऐसी बात पढ़ना होगा जिसे विधायिका ने शामिल करने से परहेज किया।"
कोर्ट ने यह भी कहा कि बैंक कानून में ऐसा कोई अधिकार या अधिकार-क्षेत्र नहीं बता सका जो एम्प्लॉयर को अपनी पसंद की अपीलीय अथॉरिटी नियुक्त करने का अधिकार देता हो। इसलिए कोर्ट ने माना कि रेस्पॉन्डेंट नंबर 1 द्वारा बनाई गई इंटरनल अपीलेट अथॉरिटी के पास अधिकार-क्षेत्र नहीं है। इसे धआरा 18 और/या नियम 11 के प्रावधानों के अनुसार गठित अपीलेट अथॉरिटी नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने कहा,
"...रेस्पॉन्डेंट्स द्वारा की गई पूरी प्रक्रिया, जिसके कारण विवादित आदेश पारित हुआ और संबंधित पेनल्टी लगाई गई, वह पूरी तरह से गैर-कानूनी आधार पर टिकी है... इससे याचिकाकर्ता को भारी नुकसान हुआ... हमारी राय में अपीलेट अथॉरिटी द्वारा पारित आदेश का कोई कानूनी अस्तित्व नहीं था, और वह भी एक ऐसी अपीलेट अथॉरिटी द्वारा पारित किया गया था जो शुरू से ही गैर-कानूनी थी।"
कोर्ट ने इस मामले से निपटने में बैंक के रवैये पर भी नाराजगी जताई और कहा कि इससे न केवल याचिकाकर्ता को बल्कि शिकायतकर्ता को भी नुकसान हुआ।
कोर्ट ने कहा,
"बैंक और अन्य ऐसे सार्वजनिक संस्थानों को कानूनी प्रावधानों की व्याख्या करते समय सावधान और सतर्क रहना चाहिए ताकि रेस्पॉन्डेंट नंबर 1/बैंक द्वारा की गई पूरी तरह से गलत व्याख्या से कोई अव्यवस्था या अराजक स्थिति पैदा न हो।"
इसके अनुसार, कोर्ट ने विवादित आदेशों को रद्द किया और याचिका स्वीकार की।
Case Title: Ashok Upadhyay v. Union Bank of India [Writ Petition No. 2385 of 2024]


