ऑटोरिक्शा और कैब परमिट के लिए मराठी भाषा की जानकारी अनिवार्य करने वाले फ़ैसले को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती
Shahadat
25 Aug 2026 6:19 PM IST

महाराष्ट्र सरकार ने सभी ऑटोरिक्शा, टैक्सी और ऐप-बेस्ड कैब ड्राइवरों के लिए 'मराठी भाषा की कामकाजी जानकारी' ज़रूरी करने के अपने फ़ैसले को 'सख्ती' से लागू करना शुरू किया। इसके कुछ दिनों बाद ही बॉम्बे हाईकोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दायर की गई। इस याचिका में फ़ैसले को चुनौती देते हुए तर्क दिया गया कि जो 'भारतीय नागरिक' अपनी रोज़ी-रोटी कमाने के लिए महाराष्ट्र आते हैं, उनके साथ 'बाहरी' लोगों जैसा व्यवहार किया जा रहा है।
यह PIL चार उबर (Uber) कैब ड्राइवरों ने दायर की। वे राज्य के गृह (परिवहन) विभाग की 12 अगस्त की उस अधिसूचना (नोटिफिकेशन) को रद्द करने की मांग कर रहे हैं, जिसमें 'मराठी भाषा की कामकाजी जानकारी' को अनिवार्य किया गया।
बुधवार को एक्टिंग चीफ जस्टिस रवींद्र घुगे की बेंच के सामने इस PIL का ज़िक्र किए जाने की संभावना है।
PIL में आरोप लगाया गया कि राज्य अपने नागरिकों के बीच भेदभाव कर रहा है और आज़ादी से घूमने-फिरने, कहीं भी बसने, जीवन जीने और समानता के अधिकार का भी उल्लंघन कर रहा है।
PIL में कहा गया,
"जो भारतीय नागरिक अपनी रोज़ी-रोटी कमाने के लिए महाराष्ट्र आते हैं, उनके साथ उनके ही देश में बाहरी लोगों जैसा व्यवहार किया जा रहा है। यह सीधे तौर पर अनुच्छेद 19(1)(d), 19(1)(e) और एक नागरिकता की संवैधानिक व्यवस्था का उल्लंघन करता है। यह जनहित याचिका राज्य में अपनी आजीविका कमाने वाले लाखों गरीब ऑटोरिक्शा ड्राइवरों, टैक्सी ड्राइवरों और ऐप-बेस्ड ड्राइवरों के व्यापक जनहित में दायर की गई। याचिकाकर्ता सम्मानपूर्वक स्पष्ट करते हैं कि वे मराठी भाषा का बहुत सम्मान करते हैं। कई याचिकाकर्ता अपने रोज़मर्रा के काम में कामकाजी मराठी बोलते और समझते हैं। याचिकाकर्ता मराठी को बढ़ावा देने का विरोध नहीं करते हैं। याचिकाकर्ता केवल यह कहना चाहते हैं कि सबसे गरीब मज़दूरों का लाइसेंस और रोज़ी-रोटी छीनकर किसी भाषा के प्रति प्रेम को ज़बरदस्ती लागू नहीं किया जा सकता और संविधान तथा मोटर वाहन अधिनियम इसकी अनुमति नहीं देते हैं।"
गौरतलब है कि 12 अगस्त की अधिसूचना के ज़रिए, गृह (परिवहन) विभाग ने महाराष्ट्र मोटर वाहन नियम, 1989 में संशोधन किया था और ऑटोरिक्शा ड्राइवरों, टैक्सी ड्राइवरों तथा ऐप-बेस्ड ड्राइवरों के लिए 'मराठी भाषा की कामकाजी जानकारी' को एक शर्त के तौर पर अनिवार्य किया। इसमें यह भी कहा गया कि अगर जांच के दौरान कोई ड्राइवर रीजनल ट्रांसपोर्ट ऑफिसर (RTO) को संतुष्ट नहीं कर पाता है तो उसका लाइसेंस पहले तीन महीने के लिए और बाद में हमेशा के लिए सस्पेंड कर दिया जाएगा। यही शर्त नए परमिट देने या मौजूदा परमिट को रिन्यू करने के लिए भी लागू होगी।
यह याचिका बॉम्बे हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के 1 मार्च, 2017 के आदेश पर आधारित है, जिसमें नवंबर 2016 के उस सर्कुलर को रद्द कर दिया गया, जिसके तहत ऑटो-रिक्शा परमिट के लिए मराठी भाषा को अनिवार्य कर दिया गया।
PIL में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि ट्रांसपोर्ट कमिश्नर और ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर ने 12 अगस्त के नोटिफिकेशन को सख्ती से लागू करने के निर्देश दिए। इसके तहत 'वायुवेग' फ्लाइंग स्क्वाड को ऑटो-रिक्शा स्टैंड और ड्राइवरों की जांच करने, एक महीने का नोटिस जारी करने और तीन महीने के लिए बैज सस्पेंड करने जैसे कदम उठाने को कहा गया है।
इसमें एक स्थानीय अखबार की रिपोर्ट का भी हवाला दिया गया, जिसमें बताया गया कि इस फैसले के लागू होने के पहले ही दिन, मुंबई के पास वसई-विरार इलाके में कुल 522 रिक्शा ड्राइवरों की जांच की गई और उनमें से 61 को लाइसेंस सस्पेंड होने की चेतावनी देते हुए नोटिस जारी किए गए। इस इलाके में यूपी-बिहार के ज़्यादातर प्रवासी रहते हैं।
PIL में कहा गया,
"जो ड्राइवर मराठी भाषा के बारे में RTO ऑफिसर को संतुष्ट नहीं कर पाता, उसका बैज तीन महीने के लिए और उसके बाद हमेशा के लिए सस्पेंड कर दिया जाता है। इस तरह उसकी रोज़ी-रोटी छिन जाती है। याचिकाकर्ताओं को हर दिन जांच, नोटिस, सस्पेंशन और अपने बैज, लाइसेंस और परमिट रद्द होने का सामना करना पड़ता है। याचिकाकर्ता गरीब लोग हैं। ड्राइविंग ही उनका एकमात्र पेशा और आय का एकमात्र स्रोत है। वे अपने परिवार का भरण-पोषण करने और गुज़ारा चलाने के लिए हर दिन सुबह से रात तक कड़ी मेहनत करते हैं। कई याचिकाकर्ता उत्तर प्रदेश राज्य से आए प्रवासी हैं, जो मुंबई में ईमानदारी से रोज़ी-रोटी कमाने आए हैं। अगर उनके बैज सस्पेंड या रद्द कर दिए जाते हैं, तो वे और उनके परिवार भुखमरी का शिकार हो जाएंगे। याचिकाकर्ता यह PIL न केवल अपने लिए, बल्कि महाराष्ट्र राज्य में लगभग 9,65,000 रिक्शा और टैक्सी परमिट और बैज धारकों के पूरे समुदाय के हित में दायर कर रहे हैं, जिनमें से बहुत बड़ी संख्या में लोग इसी तरह की स्थिति वाले गरीब ड्राइवर हैं।"
Case Title: Mohd Kasim Ahmad vs State of Maharashtra


