कस्टडी में मारपीट का मामला: बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा- पुलिस अधिकारियों पर केस चलाने के लिए पहले से मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं
Shahadat
11 July 2026 9:48 AM IST

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि कबूलनामा लेने के लिए किसी संदिग्ध के साथ मारपीट करना किसी भी पुलिस अधिकारी की सरकारी ड्यूटी का हिस्सा नहीं हो सकता। कोर्ट ने तीन पुलिसकर्मियों को बरी करने से इनकार किया, जिन पर एक व्यक्ति के साथ मारपीट करने का आरोप है—उसे हत्या का अपराध कबूल करने के लिए मजबूर किया गया। [2026 LiveLaw (Bom) 319]
कोल्हापुर बेंच में सुनवाई करते हुए जस्टिस संदेश पाटिल ने कहा कि इस मामले में शिकायतकर्ता को 26 नवंबर 2008 को दोपहर 12 बजे इचलकरंजी शहर के शिवाजी नगर पुलिस स्टेशन में तैनात पुलिसकर्मियों ने बुलाया। उसे रात 10 बजे तक वहां बिठाए रखा गया और बाद में अगली सुबह तक 'मारपीट' की गई ताकि वह हत्या का अपराध कबूल कर ले।
जज ने 9 जुलाई को सुनाए गए आदेश में कहा,
"सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांत के अनुसार, यह स्पष्ट है कि अपराध की जांच के दौरान किसी व्यक्ति के साथ मारपीट करना पुलिस अधिकारी की ड्यूटी नहीं थी। पुलिस अधिकारी जांच के बहाने किसी व्यक्ति के साथ 'थर्ड डिग्री' (सख्त पूछताछ या यातना) का इस्तेमाल नहीं कर सकते। इस मामले में, जैसा कि अभियोजन पक्ष के रिकॉर्ड से पता चलता है, पुलिस अधिकारियों द्वारा इस तरह की चोट पहुंचाना उचित नहीं था। यह नहीं कहा जा सकता कि पुलिस अधिकारी अपनी ड्यूटी निभा रहे थे या ड्यूटी निभाने के दौरान अपनी सीमा से बाहर जाकर काम कर रहे थे। मौजूदा मामले में कबूलनामा लेने के लिए संदिग्ध के साथ मारपीट करने को सरकारी ड्यूटी का हिस्सा नहीं कहा जा सकता। इसलिए धारा 197 के प्रावधान अभियोजन पक्ष के रास्ते में नहीं आएंगे।"
जज उन आपराधिक रिट याचिकाओं पर सुनवाई कर रहे थे, जिनमें सेशंस कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई। सेशंस कोर्ट ने मजिस्ट्रेट कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ उनकी याचिका खारिज की थी, जिसमें दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने का आदेश दिया गया।
अधिकारियों का तर्क था कि मजिस्ट्रेट ने कानून के प्रावधानों की व्याख्या करने में गलती की, क्योंकि उन्होंने इस तथ्य पर विचार नहीं किया कि क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (CrPC) की धारा 197 सरकारी ड्यूटी के दौरान कथित तौर पर किए गए अपराधों के लिए किसी सरकारी कर्मचारी पर मुकदमा चलाने पर रोक लगाती है।
पुलिसकर्मियों ने तर्क दिया कि वे केवल 'अपनी ड्यूटी निभा रहे थे', इसलिए उन पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। हालांकि, जस्टिस पाटिल इन दलीलों से सहमत नहीं थे।
जज ने कहा,
"आरोपी/याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई का आदेश देते समय मजिस्ट्रेट ने CrPC की धारा 197 पर विचार किया और माना कि ऐसी चोट पहुंचाना पुलिस अधिकारी का काम नहीं था। इस स्तर पर रिकॉर्ड में मौजूद तथ्य यह निष्कर्ष निकालने के लिए काफी हैं कि अभियोजन पक्ष के मामले को देखते हुए मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेशों को गलत नहीं कहा जा सकता, इसलिए उनमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।"
इन टिप्पणियों के साथ बेंच ने पुलिसकर्मियों द्वारा दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया।
Case Title: Sanjay Bapuso Dalvi vs State of Maharashtra (Criminal Writ Petition 2509 of 2022)


