बॉम्बे हाईकोर्ट का PoP गणेश मूर्ति बनाने वालों से सवाल- क्या आपके कमर्शियल फ़ायदे पर्यावरण की सुरक्षा से ज़्यादा ज़रूरी हैं?

Shahadat

17 July 2026 9:56 AM IST

  • बॉम्बे हाईकोर्ट का PoP गणेश मूर्ति बनाने वालों से सवाल- क्या आपके कमर्शियल फ़ायदे पर्यावरण की सुरक्षा से ज़्यादा ज़रूरी हैं?

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुवार (16 जुलाई) को प्लास्टर ऑफ़ पेरिस (PoP) से गणेश मूर्तियां बनाने वालों से पूछा कि क्या उनके कमर्शियल फ़ायदे पर्यावरण की सुरक्षा और समाज के व्यापक हितों से ज़्यादा ज़रूरी हो सकते हैं।

    जस्टिस अजय गडकरी और जस्टिस कमल खाता की डिवीज़न बेंच ने यह बात जनहित याचिका (PIL) पर अंतिम बहस के दौरान कही। इस याचिका में प्राकृतिक जल निकायों में PoP मूर्तियों के विसर्जन पर पूरी तरह से रोक लगाने की मांग की गई, चाहे उनकी ऊंचाई कुछ भी हो।

    PoP मूर्ति बनाने वालों के संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों से बात करते हुए जस्टिस गडकरी ने पूछा,

    "क्या लोगों के एक समूह का हित समाज के हित से ऊपर हो सकता है?"

    कोर्ट ने निर्माताओं से PoP के पर्यावरण के अनुकूल विकल्प अपनाने का भी आग्रह किया।

    जस्टिस गडकरी ने पूछा कि मूर्ति बनाने वाले PoP के इस्तेमाल पर ज़ोर देने के बजाय ऐसे मटीरियल का इस्तेमाल क्यों नहीं कर सकते जिनसे प्रदूषण न हो।

    जस्टिस गडकरी ने कहा,

    "किसी ऐसे वैकल्पिक मटीरियल का इस्तेमाल करें, जिससे प्रदूषण न हो।"

    बेंच ने गौर किया कि पिछले साल पूरे महाराष्ट्र में प्राकृतिक जल निकायों में छह फीट से ज़्यादा ऊंची 31,000 से ज़्यादा गणेश मूर्तियां विसर्जित की गईं। जजों ने कहा कि इतनी बड़ी संख्या में विसर्जन से जल निकायों में प्रदूषण होना तय है, भले ही राज्य की नीति अगले दिन मूर्तियों को हटाने की हो।

    याचिकाकर्ता रोहित जोशी की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट मिहिर देसाई ने कहा कि महाराष्ट्र सरकार की 2025 की नीति, जो प्राकृतिक जल निकायों में छह फीट से ज़्यादा ऊंची PoP मूर्तियों के विसर्जन की अनुमति देती है, वह केवल मार्च 2026 तक लागू रहने के लिए थी, जिसके बाद पूरी तरह से रोक लगाने की योजना थी।

    देसाई ने तर्क दिया कि राज्य का रुख़ उसकी अपनी स्टडीज़ के विपरीत है, जिनसे पता चला कि PoP मूर्तियां आसानी से नहीं घुलती हैं और उन पर इस्तेमाल किए जाने वाले रंग ज़हरीले होते हैं।

    देसाई ने कहा,

    "उनकी नीयत अच्छी हो सकती है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर कुछ नहीं किया जाता है।"

    उन्होंने आगे कहा कि राज्य नीति के तहत किए गए वादों को प्रभावी ढंग से लागू करने में नाकाम रहा है।

    PoP मूर्ति बनाने वालों के संगठन की ओर से पेश एडवोकेट उदय वारुंजिकर ने कोर्ट से आग्रह किया कि मौजूदा नीति को एक या दो साल और जारी रहने दिया जाए ताकि लोगों की पसंद में धीरे-धीरे बदलाव हो सके। उन्होंने ऐसे डेटा का ज़िक्र किया जिससे पता चलता है कि इको-फ़्रेंडली मूर्तियों के ऑर्डर 2023 में लगभग 3,000 से बढ़कर पिछले साल 7.8 लाख हो गए। उन्होंने कहा कि लोगों की सोच रातों-रात नहीं बदल सकती।

    राज्य की ओर से पेश एडवोकेट जनरल मिलिंद साठे ने कोर्ट को बताया कि बड़ी संख्या में भक्त पहले ही इको-फ़्रेंडली मूर्तियों को अपना चुके हैं, खासकर छह फ़ीट से कम ऊंचाई वाली मूर्तियों को। उन्होंने कहा कि पिछले साल विसर्जित की गई छह फ़ीट से ज़्यादा ऊंचाई वाली 13,000 से ज़्यादा मूर्तियां इको-फ़्रेंडली थीं।

    हालांकि, जस्टिस खाटा ने कहा कि कोर्ट के सामने मुख्य मुद्दा प्राकृतिक जल निकायों में विसर्जित की जाने वाली बड़ी मूर्तियों से जुड़ा है।

    निर्माताओं के रुख पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा:

    “हम विदेश जाते हैं तो अच्छा और साफ़ पानी देखते हैं। निर्माताओं को इन सब बातों पर विचार करना चाहिए। ऐसा तो नहीं है कि वे विदेश नहीं जाएंगे। वे ज़्यादा जागरूक क्यों नहीं हो सकते? उन्हें भी पर्यावरण की सुरक्षा के बारे में सोचना चाहिए।”

    जब वारुंजिकर ने इस आधार पर मौजूदा नीति को जारी रखने की मांग की कि गणेश उत्सव में केवल 60 से 70 दिन बचे हैं तो जस्टिस गडकरी ने जवाब दिया कि निर्माताओं को बहुत पहले ही नोटिस दिया जा चुका था और PoP के इस्तेमाल को जारी रखने की अनुमति देने से पर्यावरण को “बेहिसाब नुकसान” होगा।

    जस्टिस गडकरी ने कहा,

    “संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत आपके अधिकारों के खिलाफ कोई नहीं है। यहां तक ​​कि गाइडलाइंस भी बहुत स्पष्ट हैं कि मार्च 2026 तक यह कारोबार बंद करना होगा।”

    देसाई ने यह भी बताया कि ऐतिहासिक रूप से गणेश मूर्तियां बनाने के लिए PoP के विकल्पों का इस्तेमाल किया जाता रहा है और यहां तक ​​कि मशहूर लालबागचा राजा की मूर्ति भी हमेशा PoP से नहीं बनाई गई।

    सुनवाई के दौरान, बेंच ने गौर किया कि हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने पहले प्राकृतिक जल निकायों में PoP मूर्तियों के विसर्जन पर सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) की गाइडलाइंस को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की और उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती नहीं दी गई।

    मूर्ति निर्माताओं के एक अन्य संगठन की ओर से पेश सीनियर वकील संजीव गोरवाडकर ने तर्क दिया कि CPCB की गाइडलाइंस को कानूनी समर्थन नहीं मिला।

    इसके जवाब में जस्टिस गडकरी ने कोर्ट की चिंता दोहराते हुए पूछा कि क्या किसी खास समूह के हित व्यापक समाज के हितों से ऊपर हो सकते हैं।

    इस मामले की अगली सुनवाई 17 जुलाई को होगी।

    Case Title: Rohit Manohar Joshi vs State of Maharashtra (PIL/96/2024)

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