कस्टडी में मौत के मामले में 7 पुलिसवालों पर हत्या का आरोप बरकरार: बॉम्बे हाईकोर्ट ने 'घिनौने' यौन शोषण के आरोपों पर भी किया गौर

Shahadat

7 April 2026 8:52 PM IST

  • कस्टडी में मौत के मामले में 7 पुलिसवालों पर हत्या का आरोप बरकरार: बॉम्बे हाईकोर्ट ने घिनौने यौन शोषण के आरोपों पर भी किया गौर

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने मंगलवार (7 अप्रैल) को शहर की एक स्पेशल कोर्ट के लिए रास्ता साफ किया। अब यह कोर्ट मुंबई पुलिस के सात अधिकारियों पर हत्या और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के आरोप तय कर सकेगी। इन अधिकारियों के नाम 2014 के एग्नेलो वाल्डारिस की कस्टडी में हुई मौत के मामले में आए थे।

    जस्टिस अजय गडकरी और जस्टिस श्याम चंदक की डिवीज़न बेंच ने 17 सितंबर, 2022 को स्पेशल POCSO कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश को सही ठहराया। इस आदेश में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 377 (अप्राकृतिक यौन संबंध), 302 (हत्या), 295-A (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना) और अन्य प्रावधानों के साथ-साथ POCSO Act के संबंधित प्रावधानों के तहत आरोप तय किए गए।

    बता दें, स्पेशल कोर्ट के इस आदेश को छह अधिकारियों ने हाईकोर्ट में एक पुनर्विचार याचिका (Revision Petition) के ज़रिए चुनौती दी थी। सिंगल-जज जस्टिस अमित बोरकर ने 16 दिसंबर, 2022 को आदेश पारित करते हुए याचिका खारिज की।

    हालांकि, सातवें पुलिसवाले द्वारा दायर अलग पुनर्विचार याचिका पर 20 अप्रैल, 2023 को सिंगल-जज जस्टिस भारती डांगरे की बेंच ने फैसला सुनाया। उन्होंने सबूतों में कुछ 'विसंगतियां' (Inconsistencies) बताते हुए स्पेशल कोर्ट के उस आदेश को रद्द किया, जिसमें धारा 302 और 295-A के तहत आरोप तय किए गए।

    इसके बाद जस्टिस डांगरे के आदेश को एग्नेलो के पिता लियोनार्ड ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों सिंगल-जजों के आदेशों में अलग-अलग राय को देखते हुए मामले को वापस हाई कोर्ट भेज दिया। कोर्ट ने यह पाया कि जस्टिस डांगरे को जब वे जस्टिस बोरकर के आदेश से असहमत थीं, तो उन्हें यह मामला डिवीज़न बेंच के पास भेजना चाहिए था।

    तदनुसार, जस्टिस गडकरी की अगुवाई वाली बेंच को यह मामला सौंपा गया ताकि वे यह तय कर सकें कि क्या ट्रायल कोर्ट ने दोषी पुलिसवालों के खिलाफ धारा 302 और 295A को सही तरीके से लागू किया।

    अपने 32-पृष्ठों के फ़ैसले में जजों ने कहा,

    "हम यह मानते हैं कि ट्रायल कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री पर कानून के मुताबिक़ ही विचार किया और सही कारण बताते हुए इस सही नतीजे पर पहुंचा है कि अगर इस सामग्री का खंडन नहीं किया गया तो इससे मामले में आरोपियों को दोषी ठहराया जा सकता है। इसी के मुताबिक़, ट्रायल कोर्ट ने यह आदेश पारित किया। इस नतीजे पर पहुंचने के बाद हमें इस आदेश को गैर-कानूनी या गलत मानने का कोई कारण नज़र नहीं आता।"

    जजों ने अपने रिकॉर्ड में यह भी कहा कि वे 16 दिसंबर, 2022 के आदेश में जस्टिस बोरकर द्वारा व्यक्त किए गए विचार से पूरी तरह सहमत हैं, जिसमें उन्होंने आरोपी पुलिसकर्मियों की पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज कर दिया।

    संदर्भ के लिए, एग्नेलो और तीन अन्य लोगों (जिनमें एक नाबालिग भी शामिल था) को कथित तौर पर वडाला पुलिस स्टेशन के अधिकारियों ने 15 और 16 अप्रैल, 2014 की दरमियानी रात को एक लूट के मामले में हिरासत में लिया था। हिरासत में लेने के बाद उनके साथ शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से मारपीट और यातनाएं दी गईं। पुलिस ने 17 अप्रैल को तीन आरोपियों की गिरफ्तारी दिखाई और तभी लियोनार्ड ने मजिस्ट्रेट (जिनके सामने उन तीन अन्य लोगों को पेश किया गया) से शिकायत की।

    इसके बाद पुलिस ने 18 अप्रैल को एग्नेलो की गिरफ्तारी दिखाई। उसे उसी दिन 'नाइट कोर्ट' के सामने पेश करने का आदेश दिया गया, लेकिन पुलिस ने इस आदेश का पालन नहीं किया, क्योंकि मेडिकल जांच के दौरान मृतक ने ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर से पुलिस द्वारा दी गई यातनाओं के बारे में शिकायत की थी।

    हालांकि, गिरफ्तारी और मेडिकल जांच के बाद एग्नेलो को आदेश के मुताबिक़ कोर्ट में पेश नहीं किया गया; जब उसने हिरासत से भागने की कोशिश की तो वह वडाला रेलवे स्टेशन पर एक चलती हुई लोकल ट्रेन की ओर भागा, ट्रेन से टकरा गया और मौके पर ही उसकी मौत हो गई।

    रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के संबंध में जजों ने उन तीन अन्य लड़कों की गवाही का ज़िक्र किया, जिन्हें एग्नेलो के साथ ही हिरासत में लिया गया। इन लड़कों ने गवाही दी कि शारीरिक और मानसिक यातनाओं के अलावा, उन्हें एक-दूसरे के साथ और यहाँ तक कि आरोपी पुलिसकर्मियों के साथ भी यौन दुर्व्यवहार करने के लिए मजबूर किया गया।

    बेंच ने अपने आदेश में कहा,

    "यह यौन दुर्व्यवहार इतना घिनौना था कि कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि पुलिस के दबाव में किसी पुलिस स्टेशन के भीतर इस तरह का अपमान भी हो सकता है। मुख्य मुद्दे को ध्यान में रखते हुए हम पुलिस की आम छवि को बचाने के लिए इस आदेश में उस दुर्व्यवहार का ज़िक्र करना उचित नहीं समझते।"

    बेंच ने पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और अन्य मेडिकल रिकॉर्ड पर भरोसा किया, जिनसे पता चला कि एग्नेलो के शरीर पर कई चोटें थीं; इनमें से कुछ चोटें 12 घंटे से ज़्यादा पुरानी थीं, जबकि कुछ 24 से 96 घंटे पुरानी थीं। जजों ने इस बात पर गौर किया कि अपने मेडिकल चेक-अप के दौरान, एग्नेलो ने डॉ. एजाज़ हुसैन से अपनी चोटों और पुलिस द्वारा दी गई यातना के बारे में शिकायत की थी। यह भी बताया था कि पुलिस अधिकारियों ने उन्हीं चोटों को 'खुद से पहुंचाई गई' चोटें दिखाने की कोशिश की थी।

    बेंच ने फैसला सुनाया,

    "चूंकि एग्नेलो ने डॉ. एजाज़ हुसैन से अपने ऊपर हुए टॉर्चर की शिकायत की थी, इसलिए आरोपी पुलिस अधिकारियों के मन में यह डर था कि उनके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई हो सकती है। इसलिए आरोपी किसी भी तरह एग्नेलो को अपने काबू में करना चाहते थे ताकि उसे डॉ. एजाज़ हुसैन से की गई टॉर्चर की शिकायत वापस लेने या इस मामले को आगे न बढ़ाने के लिए तैयार कर सकें। हालांकि, हालात आरोपी पुलिस अधिकारियों के पक्ष में नहीं रहे, क्योंकि एग्नेलो की मौत ऐसे हालात में हुई, जिनकी जानकारी आरोपियों को थी।"

    बेंच ने बताया कि शुरू से ही एग्नेलो और उसके तीन साथियों के आस-पास सिर्फ आरोपी ही मौजूद थे, और वे ही उन हालात में शामिल थे, जिनकी वजह से एग्नेलो की मौत हुई।

    जजों ने टिप्पणी की,

    "इसलिए पुलिस के खिलाफ चाहे वह कोई भी हो प्रतिकूल निष्कर्ष निकालना जायज़ है। इस पृष्ठभूमि में अगर बहस के लिए हम आरोपी पुलिस अधिकारियों के वकील की बात मान भी लें कि एग्नेलो की पुरानी चोटों का उसकी मौत से कोई लेना-देना नहीं था, तब भी यह सच है कि पुलिस हिरासत में रहते हुए उसकी मौत सामान्य हालात से अलग परिस्थितियों में हुई। इसके अलावा, उसे इतनी बुरी तरह टॉर्चर किया गया कि आरोपी पुलिस अधिकारियों द्वारा और टॉर्चर से बचने के लिए वह एक चलती ट्रेन की तरफ भाग गया।"

    इन टिप्पणियों के साथ बेंच ने स्पेशल कोर्ट के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें इन पुलिसकर्मियों के खिलाफ आरोप तय किए गए- जितेंद्र राठौड़ (सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर), अर्चना पुजारी (असिस्टेंट इंस्पेक्टर), शत्रुघ्न टोंडसे (पुलिस सब-इंस्पेक्टर), सुरेश माने (हेड कांस्टेबल), और कांस्टेबल रविंद्र माने, विकास सूर्यवंशी, सत्यजीत कांबले और तुषार खैरनार।

    Case Title: Jitendra Ramnarayan Rathod vs Central Bureau of Investigation (Criminal Writ Petition 4451 of 2022)

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