डॉक्टर्स पर ऑक्सीजन सप्लाई बंद करने का आरोप: बॉम्बे हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने से किया इनकार
Shahadat
25 Sept 2026 9:14 AM IST

बॉम्बे हाईकोर्ट ने बुधवार (23 सितंबर) को एक ही परिवार के तीन लोगों के खिलाफ दर्ज FIR रद्द करने से इनकार किया। इन लोगों पर पुणे के अस्पताल के ICU वार्ड की ऑक्सीजन सप्लाई बंद करने का आरोप है।
सिंगल-जज जस्टिस रंजीतसिंह भोसले ने कहा कि इन तीनों लोगों के खिलाफ प्रथम दृष्टया (prima facie) मजबूत मामला बनता है, और ये तीनों प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टर हैं।
बेंच ने याचिका खारिज करते हुए कहा,
"मेरी राय में मामले के तथ्य CrPC की धारा 482 के तहत कोर्ट के इनहेरेंट ज्यूरिस्डिक्शन (अंतर्निहित अधिकार क्षेत्र) का इस्तेमाल करने का आधार नहीं बनाते हैं। मेरी राय में, FIR में लगाए गए आरोप याचिकाकर्ताओं के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनाते हैं। याचिकाकर्ताओं को ट्रायल के दौरान क्रॉस-एग्जामिनेशन या अपने बचाव पक्ष के गवाहों से पूछताछ करके अपना बचाव पेश करने की छूट है।"
रिकॉर्ड पर मौजूद जानकारी के अनुसार, आरोपी याचिकाकर्ता डॉ. रमेश सोनावणे, डॉ. भूषण सोनावणे और डॉ. हर्षल सोनावणे डॉ. महेंद्र चव्हाण द्वारा चलाए जा रहे अस्पताल में घुस गए। उन्होंने शिकायतकर्ता (अस्पताल के ICU में इलाज करा रहे एक बच्चे के रिश्तेदार) को धमकाया और उनके साथ बदसलूकी की।
वास्तव में, याचिकाकर्ता डॉ. चव्हाण के ससुराल वाले हैं और उन्होंने यह अस्पताल अपनी बेटी (चव्हाण की पत्नी) को "गिफ्ट" के तौर पर दिया था। अभियोजन पक्ष का कहना है कि शिकायतकर्ता का बच्चा गंभीर रूप से बीमार होने के कारण अस्पताल की ICU सुविधा में भर्ती था। घटना के दिन याचिकाकर्ता अस्पताल में घुस आए, शिकायतकर्ता से पूछा कि वे ICU वार्ड के बाहर क्यों बैठे हैं, उनसे बच्चे को किसी दूसरे अस्पताल में शिफ्ट करने को कहा और डॉ. चव्हाण को जान से मारने की धमकी भी दी।
अचानक हुए हंगामे के कारण जब डॉ. चव्हाण और अस्पताल के अन्य कर्मचारी मौके पर पहुंचे तो याचिकाकर्ताओं ने कथित तौर पर डॉ. चव्हाण के साथ बदसलूकी और धमकी देना शुरू कर दिया। इसी बीच उन्होंने ICU सुविधा की ऑक्सीजन सप्लाई भी बंद कर दी, जिससे शिकायतकर्ता के बच्चे की हालत बिगड़ गई। हालांकि, डॉक्टरों ने बच्चे का इलाज किया और उसके वाइटल्स (शरीर के ज़रूरी संकेत) को सामान्य कर दिया।
बाद में डॉ. चव्हाण ने शिकायतकर्ता को बताया कि याचिकाकर्ता उनके ससुराल वाले थे और इसी आधार पर यह FIR दर्ज की गई।
दूसरी ओर, याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि डॉ. चव्हाण के बच्चे बीमार थे और उन्हें बुखार था, और डॉ. चव्हाण उनकी देखभाल नहीं कर रहे थे, क्योंकि वे अपनी पत्नी के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते थे। इसलिए याचिकाकर्ता केवल उन दो बच्चों को सही दवा देने के लिए अस्पताल गए। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि यह FIR केवल बदला लेने का एक ज़रिया थी।
जस्टिस भोंसले ने कहा,
"शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया सही प्रतीत होते हैं। शिकायतकर्ता ने डॉ. चव्हाण से नाम पता चलने के बाद ही याचिकाकर्ताओं का नाम लिया। यह रिकॉर्ड की बात है कि उस समय शिकायतकर्ता का बेटा ICU में भर्ती था। चार्जशीट दाखिल कर दी गई, जिसमें नर्सों, अस्पताल के कर्मचारियों और अस्पताल के वॉचमैन सहित कई गवाहों के बयान शामिल हैं। चार्जशीट को देखने से यह भी पता चलता है कि याचिकाकर्ताओं की मौजूदगी से इनकार नहीं किया जा सकता। बयानों के रूप में रिकॉर्ड पर इतना पर्याप्त मटीरियल मौजूद है, जिससे याचिकाकर्ताओं के खिलाफ अपराध बनता है।"
याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए सभी बचावों के संबंध में जज ने कहा कि उन पर ट्रायल के दौरान विचार किया जाएगा और उनकी जांच की जाएगी।
इसलिए जज ने याचिका खारिज की और FIR रद्द करने से इनकार किया।
Case Title: Dr Ramesh Kisanrao Sonawane vs State of Maharashtra (Writ Petition 2553 of 2022)

