मोबाइल वीडियो में ₹300 की रिश्वत मांगने का सबूत: बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुलिस को धमकाने के आरोपी के खिलाफ मामला रद्द किया
Shahadat
22 Sept 2026 9:22 AM IST

बॉम्बे हाईकोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 353, 504 और 506 के तहत आरोपी व्यक्ति के खिलाफ़ चार्जशीट रद्द की। कोर्ट ने पाया कि मोबाइल फ़ोन फुटेज और WhatsApp बातचीत से पहली नज़र में यह पता चलता है कि शिकायतकर्ता पुलिस कॉन्स्टेबल ने उसका ड्राइविंग लाइसेंस लौटाने के बदले उससे ₹300 की मांग की। कोर्ट ने कहा कि इसके बाद आरोपी पर आपराधिक धमकी का झूठा मामला थोपा गया, और अभियोजन पक्ष की कहानी को "पूरी तरह से अविश्वसनीय" और "झूठी और मनगढ़ंत" पाया।
जस्टिस मिलिंद एन. जाधव आपराधिक अर्जी पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें भारतीय दंड संहिता (IPC), 1860 की धाराओं 353, 504 और 506 के तहत दर्ज FIR रद्द करने की मांग की गई। शिकायतकर्ता एक पुलिस कॉन्स्टेबल था, जबकि आवेदक गहनों का कारोबार करता था।
यह घटना तब हुई जब शिकायतकर्ता ने आवेदक से उसके वाहन के कागजात और लाइसेंस दिखाने को कहा, और लाइसेंस लौटाए बिना कागजात वापस कर दिए। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि आवेदक ने शिकायतकर्ता के साथ दुर्व्यवहार किया, उसकी शर्ट का कॉलर पकड़ा और उसे धमकाया व डराया-धमकाया।
आवेदक का कहना था कि शिकायतकर्ता ने बिना हेलमेट के गाड़ी चलाने के लिए उस पर आपराधिक मामला दर्ज करने की धमकी दी और लाइसेंस लौटाने के लिए जुर्माने के तौर पर ₹500 या मामले को सुलझाने के लिए रिश्वत के तौर पर ₹300 की मांग की। आवेदक ने यह भी बताया कि जब वह शिकायतकर्ता के खिलाफ़ NC (गैर-संज्ञेय अपराध की शिकायत) दर्ज कराने पुलिस स्टेशन गया, तो उसे पुलिस स्टेशन में ही रोक लिया गया।
कोर्ट ने पाया कि आवेदक ने घटना को अपने मोबाइल फ़ोन पर रिकॉर्ड किया, जिसमें शिकायतकर्ता द्वारा लाइसेंस न लौटाना और उसे लौटाने के बदले ₹300 की मांग करना शामिल था।
कोर्ट ने घटना के संबंध में शिकायतकर्ता और पुलिस अधिकारियों व वरिष्ठ अधिकारियों के बीच हुई WhatsApp बातचीत और संदेशों के ट्रांसक्रिप्ट का हवाला देते हुए कहा:
"...पुलिस स्टेशन में असल में क्या हुआ, इससे पहली नज़र में पता चलता है कि शिकायतकर्ता और उसके सहयोगियों ने आवेदक के खिलाफ़ आपराधिक धमकी का झूठा मामला थोपने में अहम भूमिका निभाई है।"
कोर्ट ने इसे पहली नज़र में अविश्वसनीय पाया कि शिकायतकर्ता द्वारा बताई गई परिस्थितियों में आवेदक किसी सार्वजनिक स्थान पर पुलिस कॉन्स्टेबल की शर्ट का कॉलर पकड़ेगा और उसे धमकाएगा। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि शिकायतकर्ता के बयान में सिर्फ़ इस बात का ज़िक्र था कि आरोपी बिना हेलमेट के मोटरसाइकिल चला रहा था। लाइसेंस छीनने के कथित मामले पर जान-बूझकर कोई बात नहीं की गई।
कोर्ट ने कहा,
"इसमें लाइसेंस छीनने के मामले पर जान-बूझकर कोई बात नहीं की गई, क्योंकि किसी भी पुलिस कॉन्स्टेबल को यह अधिकार नहीं है कि वह बिना हेलमेट मोटरसाइकिल चलाने वाले का लाइसेंस ज़ब्त कर सके।"
कोर्ट ने माना कि आरोपी को हिरासत में रखने और कथित तौर पर परेशान करने के आरोपों की सच्चाई का पता लगाने का एकमात्र तरीका पुलिस स्टेशन का CCTV फ़ुटेज ही हो सकता था। हालांकि, अभियोजन पक्ष ने बताया कि CCTV फ़ुटेज, जिसे सुरक्षित रखा जाना चाहिए था, उपलब्ध नहीं था।
इन हालात में कोर्ट ने कहा:
"अभियोजन पक्ष की कहानी न केवल अविश्वसनीय है, बल्कि मेरी राय में यह एक झूठी और मनगढ़ंत कहानी है और आरोपी पर थोपा गया मामला है।"
इसके बाद कोर्ट ने अर्ज़ी मंज़ूर की और चार्जशीट व कार्यवाही रद्द की। साथ ही कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि अगर आरोपी का लाइसेंस ज़ब्त किया गया तो उसे वापस कर दिया जाए।
Case Title: Mukesh W. Siyal v. State of Maharashtra [Criminal Application No. 612 of 2018]

