बॉम्बे हाईकोर्ट ने पीने के पानी के संकट पर महाराष्ट्र सरकार को फटकार लगाई, कहा - एक प्रगतिशील राज्य बहाने नहीं बना सकता

Shahadat

22 Jun 2026 8:39 PM IST

  • बॉम्बे हाईकोर्ट ने पीने के पानी के संकट पर महाराष्ट्र सरकार को फटकार लगाई, कहा - एक प्रगतिशील राज्य बहाने नहीं बना सकता

    आज़ादी के 75 साल बाद भी अगर किसी नागरिक को पीने का साफ़ पानी उपलब्ध कराने के लिए राज्य को निर्देश देने की मांग को लेकर संवैधानिक अदालत का दरवाज़ा खटखटाना पड़े तो ऐसे हालात में महाराष्ट्र जैसे प्रगतिशील राज्य की ओर से राहत न देने के लिए बहाने नहीं सुने जा सकते। बॉम्बे हाई कोर्ट ने सोमवार (22 जून) को यह टिप्पणी की, क्योंकि राज्य के कई हिस्सों में पीने का पानी नहीं मिल रहा है।

    जस्टिस अजय गडकरी और जस्टिस कमल खाता की डिवीज़न बेंच ने महाराष्ट्र सरकार से कहा कि वे मंगलवार (23 जून) तक राज्य के सभी नागरिकों को पानी उपलब्ध कराने की कोई योजना दिखाएं और उसे जल्द से जल्द लागू करें।

    जजों ने मौखिक रूप से टिप्पणी की,

    "आज़ादी के 75 साल बाद भी क्या भारत के लोगों को पीने के पानी के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाना पड़ेगा? हमें बताएं कि क्या नागरिकों को पीने का पानी उपलब्ध कराने के लिए राज्य की कोई योजना है? मेलघाट को छोड़ दें तो पूरे महाराष्ट्र में नागरिकों को पीने के पानी के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाना पड़ रहा है। पानी की सप्लाई होनी चाहिए। पानी मिलना ही चाहिए। हम चाहते हैं कि योजना लागू हो। एक के बाद एक आदेश जारी किए गए हैं। राज्य बहुत कम काम कर रहा है, इसीलिए लोग अदालत का दरवाज़ा खटखटा रहे हैं।"

    जस्टिस गडकरी ने राज्य को डॉ. बी.आर. अंबेडकर के उस भाषण की भी याद दिलाई, जो उन्होंने संविधान सभा में भारत का संविधान पेश करते समय दिया। जजों ने राज्य के हलफनामे की एक लाइन पर आपत्ति जताई, जिसमें कहा गया कि जब भी 'संकेत' मिलेगा, पानी की सप्लाई की जाएगी।

    जस्टिस गडकरी ने कहा,

    "क्या आपको याद नहीं है कि हमारे संविधान को पेश करते समय डॉ. अंबेडकर ने अपने भाषण में क्या कहा? आपको संकेत की क्या ज़रूरत है? पानी की सप्लाई होनी ही चाहिए... हमें बताएं कि आप किसी गांव के आखिरी व्यक्ति तक पीने का पानी कैसे पहुंचाएंगे, बशर्ते आप उस व्यक्ति को भारत का नागरिक मानते हों... हमें कल ही ऐसी योजना दें, जिससे हर नागरिक को पीने का पानी मिल सके... वे किसी सब्सिडी की मांग नहीं कर रहे हैं, वे अपने मौलिक अधिकारों के लिए यहां आए हैं।"

    ये टिप्पणियां 2007 से लंबित याचिकाओं के एक समूह की सुनवाई के दौरान की गईं। इन याचिकाओं में महाराष्ट्र के मेलघाट इलाके के आदिवासी बेल्ट में पीने के पानी, पौष्टिक भोजन और मेडिकल सुविधाओं जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी का मुद्दा उठाया गया, जहां कुपोषण और मेडिकल सुविधाओं तक पहुंच न होने के कारण हर साल सैकड़ों बच्चों, स्तनपान कराने वाली माताओं और गर्भवती महिलाओं की मौत हो जाती है।

    याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट जुगलकिशोर गिल्डा ने इस बात पर ज़ोर दिया कि पिछले आठ दिनों से मेलघाट में पानी की सप्लाई नहीं हो रही है। इस पर बेंच ने कहा कि राज्य को हर नागरिक को पीने का पानी उपलब्ध कराना होगा, चाहे वह मेलघाट में रहता हो या किसी अन्य इलाके में।

    जस्टिस गडकरी ने साफ कहा,

    "आप एक प्रगतिशील राज्य हैं... आप नागरिकों को पीने का पानी न देने के लिए कोई बहाना नहीं बना सकते... यह उनका मौलिक अधिकार है।"

    इन टिप्पणियों के साथ बेंच ने सुनवाई मंगलवार तक के लिए टाल दी ताकि राज्य सभी नागरिकों को पीने के पानी की सुविधा उपलब्ध कराने की अपनी योजना बता सके।

    Case Title: Dr Rajendra Sadanand Burma vs State of Maharashtra (PIL/133/2007)

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