"गंभीर चिंता का विषय": बॉम्बे हाईकोर्ट ने ट्रस्ट मामले में विशेष अधिकारी द्वारा पूर्व चीफ जस्टिस के नाम के दुरुपयोग पर सवाल उठाए

  • गंभीर चिंता का विषय: बॉम्बे हाईकोर्ट ने ट्रस्ट मामले में विशेष अधिकारी द्वारा पूर्व चीफ जस्टिस के नाम के दुरुपयोग पर सवाल उठाए

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने विशेष अधिकारी द्वारा तत्कालीन चीफ जस्टिस के नाम पर जारी किए गए एक आदेश को रद्द कर दिया। इस आदेश में नासिक के मंदिर ट्रस्ट के लिए अनुशंसित ट्रस्टियों की सूची को वापस लेने और निलंबित करने का निर्देश दिया गया था।

    कोर्ट ने माना कि अधिकारी का यह कदम बेहद अनुचित और कानून के खिलाफ था। कोर्ट ने कहा कि विशेष अधिकारी ने चीफ जस्टिस के नाम का दुरुपयोग किया और उनका यह आचरण संभवतः गंभीर कदाचार की श्रेणी में आता है।

    जस्टिस जी.एस. कुलकर्णी और जस्टिस डॉ. नीला गोखले की खंडपीठ याचिका पर सुनवाई कर रही थी। यह याचिका 14 मार्च, 2026 को प्रतिवादी नंबर 4 द्वारा जारी किए गए आदेश को चुनौती देने के लिए दायर की गई। उस समय प्रतिवादी नंबर 4 बॉम्बे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के विशेष अधिकारी के पद पर तैनात थे। यह चुनौती उन पांच उम्मीदवारों की ओर से दी गई, जिन्हें नासिक (सप्तश्रृंग गढ़) स्थित 'श्री सप्तश्रृंग निवासिनी देवी ट्रस्ट' में ट्रस्टी के रूप में नियुक्त करने के लिए चुना गया।

    इस आदेश में कहा गया कि बॉम्बे हाईकोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस ने निर्देश दिया कि प्रिंसिपल जिला एवं सेशंस जज द्वारा 12 मार्च, 2026 को प्रकाशित ट्रस्टियों की अनुशंसित सूची को वेबसाइट से हटा दिया जाए और अगले आदेश तक रोक दिया जाए। इसी के खिलाफ उन पांच अनुशंसित उम्मीदवारों ने याचिका दायर की थी।

    याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि चीफ जस्टिस के विशेष अधिकारी (प्रतिवादी नंबर 4) द्वारा जारी किया गया यह आदेश पूरी तरह से अधिकार क्षेत्र से बाहर और अवैध है। उन्होंने कहा कि 'महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट्स एक्ट' के तहत मुख्य न्यायाधीश को ऐसा कोई निर्णय लेने का अधिकार नहीं है।

    कोर्ट ने गौर किया कि विशेष अधिकारी ने अपने हलफनामे में कहा कि यह आदेश पूरी तरह से तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के मौखिक निर्देशों पर जारी किया गया। हालांकि, प्रतिवादियों के वकील ने स्वीकार किया कि चीफ जस्टिस के सामने कोई आधिकारिक प्रस्ताव नहीं रखा गया और यह आदेश जारी करने से पहले उनसे कोई मंजूरी भी नहीं ली गई।

    कोर्ट ने टिप्पणी की,

    "...याचिकाकर्ताओं की ओर से बताए गए अनुसार, ऐसा लगता है कि यह विवादित पत्र ऐसे कारणों से जारी किया गया, जिन्हें कानूनन सही नहीं ठहराया जा सकता, और इसे जारी करते समय प्रशासनिक प्रक्रिया का भी पालन नहीं किया गया।"

    कोर्ट को हलफनामों में ऐसा कोई आधार नहीं मिला, जो चीफ जस्टिस के नाम पर यह पत्र जारी करने को सही ठहरा सके। कोर्ट ने विशेष अधिकारी (स्पेशल ऑफिसर) के इस स्पष्टीकरण को मानने से इनकार किया कि उन्होंने केवल चीफ जस्टिस के निर्देशों का पालन किया था। कोर्ट ने कहा कि इस पत्र को कानूनी तौर पर चीफ जस्टिस का फैसला नहीं माना जा सकता।

    कोर्ट ने टिप्पणी की,

    "हम यह मानने से इनकार करते हैं कि इस विवादित पत्र में दिए गए निर्देशों को कानूनन तत्कालीन माननीय चीफ जस्टिस का फैसला माना जा सकता है... यह साफ तौर पर एक ऐसा मामला है, जिसमें माननीय चीफ जस्टिस/प्रतिवादी नंबर 4 के विशेष अधिकारी ने बॉम्बे हाईकोर्ट के माननीय चीफ जस्टिस के नाम का गलत इस्तेमाल किया..."

    कोर्ट ने जोर देकर कहा कि माननीय चीफ जस्टिस की पूर्व मंजूरी के बिना इस विवादित पत्र को स्वीकार करने का मतलब होगा - रजिस्ट्री के एक जिम्मेदार अधिकारी (जो बहुत भरोसेमंद पद पर था) की गलत हरकतों को नजरअंदाज करना।

    कोर्ट ने कहा:

    "अगर हम इस विवादित पत्र को कोई मान्यता देते हैं... तो हम उस अधिकारी की हरकतों को सही ठहरा रहे होंगे... जो माननीय चीफ जस्टिस ऑफिस में एक बहुत ही भरोसेमंद पद पर था, और जिसने इस उच्च पद की गरिमा का दुरुपयोग किया। हमारी राय में, ऐसा आचरण न केवल बेहद गलत है, बल्कि प्रतिवादी संख्या 4 द्वारा यह पत्र जारी करना एक गंभीर कदाचार (Misconduct) भी हो सकता है।"

    कोर्ट ने संबंधित प्रतिवादी के इस आचरण को गंभीर चिंता का विषय माना।

    प्रतिवादी के पद की सीमाओं को स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने कहा:

    "सिर्फ माननीय चीफ जस्टिस के सचिवालय में काम करने का मतलब यह नहीं है कि किसी को ऐसे गैर-कानूनी पत्र जारी करने की छूट मिल जाती है—ऐसे पत्र जिन्हें खुद माननीय चीफ जस्टिस भी प्रशासनिक स्तर पर कभी जारी नहीं करते।"

    इसके अनुसार, न्यायालय ने विशेष अधिकारी द्वारा 14 मार्च, 2026 को जारी किए गए पत्र को रद्द किया। साथ ही नासिक के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश के उस आदेश को भी खारिज किया, जिसके तहत चयन प्रक्रिया पर रोक लगाई गई।

    Case Title: Vishnu Trimbak Warungase v. State of Maharashtra [Writ Petition No. 5068 of 2026]

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