बॉम्बे हाईकोर्ट ने AI-जनरेटेड, असत्यापित दलीलें दाखिल करने पर पक्षकार को फटकारा, ₹50,000 का जुर्माना लगाया

Praveen Mishra

16 Jan 2026 2:58 PM IST

  • बॉम्बे हाईकोर्ट ने AI-जनरेटेड, असत्यापित दलीलें दाखिल करने पर पक्षकार को फटकारा, ₹50,000 का जुर्माना लगाया

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में एक मामले में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के दुरुपयोग पर कड़ी नाराज़गी जताते हुए एक पक्षकार पर ₹50,000 का जुर्माना लगाया। अदालत ने पाया कि संबंधित पक्ष ने अपनी लिखित दलीलों में एक ऐसा न्यायिक फैसला उद्धृत किया, जो वास्तव में अस्तित्व में ही नहीं था और जिसे संभवतः AI टूल की मदद से गढ़ा गया था।

    यह मामला मुंबई के ओशिवारा इलाके में स्थित एक फ्लैट को लेकर दो फिल्म निर्माताओं के बीच विवाद से जुड़ा था, जिस पर महाराष्ट्र किराया नियंत्रण अधिनियम, 1999 लागू होता है।

    इस मामले की सुनवाई जस्टिस मिलिंद साठे कर रहे थे।

    प्रतिवादी मोहम्मद यासीन, जो स्वयं पक्षकार के रूप में पेश हुए थे, ने फरवरी और अप्रैल 2025 में अदालत में लिखित दलीलें दाखिल की थीं। इन दलीलों में उन्होंने “Jyoti w/o Dinesh Tulsiani Vs Elegant Associates” नामक एक कथित फैसले का हवाला दिया। हालांकि, न तो उस फैसले का कोई संदर्भ (citation) दिया गया था और न ही उसकी प्रति संलग्न की गई थी।

    न्यायालय और लॉ क्लर्क्स ने उस फैसले को खोजने की भरपूर कोशिश की, लेकिन वह कहीं भी—यहां तक कि इंटरनेट पर भी—उपलब्ध नहीं पाया गया। जस्टिस साठे ने यह भी नोट किया कि दलीलों में हरे रंग के टिक मार्क, बुलेट पॉइंट्स और बार-बार दोहराए गए वाक्य जैसे संकेत मौजूद थे, जो यह दर्शाते हैं कि ये दलीलें ChatGPT जैसे किसी AI टूल की सहायता से तैयार की गई थीं।

    अपने फैसले में जस्टिस साठे ने कहा कि शोध के लिए AI टूल्स का उपयोग स्वागतयोग्य है, लेकिन इसके साथ बड़ी जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि AI से प्राप्त सामग्री को बिना सत्यापन के अदालत में पेश करना न केवल अनुचित है, बल्कि इससे न्यायालय का कीमती समय भी नष्ट होता है।

    अदालत ने इस प्रवृत्ति की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि गैर-मौजूद या अप्रासंगिक सामग्री अदालत में 'डंप' करना न्याय में सहायता नहीं बल्कि न्याय के त्वरित वितरण में बाधा है। न्यायमूर्ति ने चेतावनी दी कि यदि किसी अधिवक्ता द्वारा ऐसा किया जाता है, तो उसके खिलाफ बार काउंसिल को संदर्भित करने जैसी कड़ी कार्रवाई भी की जा सकती है।

    इन टिप्पणियों के साथ, अदालत ने प्रतिवादी मोहम्मद यासीन पर ₹50,000 का जुर्माना लगाया और निर्देश दिया कि यह राशि दो सप्ताह के भीतर हाईकोर्ट एम्प्लॉइज़ मेडिकल फंड में जमा की जाए तथा भुगतान का प्रमाण रजिस्ट्री में प्रस्तुत किया जाए।

    मामले के गुण-दोष (merits) पर भी अदालत ने प्रतिवादी की दलीलों में कोई दम नहीं पाया और उसे तत्काल विवादित फ्लैट खाली कर उसका कब्ज़ा याचिकाकर्ता को सौंपने का आदेश दिया।

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