धार्मिक जुलूसों में शोर की सीमा लागू करने के लिए मंडलों को सिक्योरिटी डिपॉज़िट जमा करना होगा, पटाखों पर लगेगी रोक: बॉम्बे हाईकोर्ट
Shahadat
22 Sept 2026 7:27 PM IST

बॉम्बे हाईकोर्ट ने मंगलवार (22 सितंबर) को कहा कि वह विस्तृत आदेश जारी करेगा, जिसमें तय सीमा से ज़्यादा शोर करने वाले पटाखों और धार्मिक जुलूसों के दौरान ढोल समूहों द्वारा म्यूज़िकल इंस्ट्रूमेंट के तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले सिलेंडरों के इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगाई जाएगी।
जस्टिस गिरीश कुलकर्णी और जस्टिस डॉ. नीला गोखले की डिवीज़न बेंच ने सोमवार को धार्मिक जुलूसों के दौरान होने वाले शोर प्रदूषण के मुद्दे पर स्वतः संज्ञान (suo motu cognizance) लिया था।
मामला जब सुनवाई के लिए आया तो बेंच ने एमिक्स क्यूरी (अदालत के सहयोगी वकील) एस्पी चिनॉय और महाराष्ट्र के एडवोकेट जनरल डॉ. मिलिंद साठे की दलीलें सुनने के बाद कहा कि वह जल्द ही इस पर एक विस्तृत आदेश जारी करेगी।
अदालत ने उन मुख्य आदेशों का ज़िक्र किया जो वह जारी करने वाली है:
- सार्वजनिक सड़कों पर पटाखे फोड़ने पर पूरी तरह रोक लगाने का आदेश दिया जाएगा।
- मंडलों के लिए जुलूस की मंज़ूरी से जुड़े दस्तावेज़ों को प्रदर्शित करना अनिवार्य किया जाएगा।
- पुलिस और अन्य संबंधित अधिकारियों को ऐसे जुलूसों के दौरान डेसिबल स्तर को रिकॉर्ड करना होगा और उसे नियंत्रित करना होगा; अगर शोर तय डेसिबल सीमा से ज़्यादा हो, तो कानून के अनुसार कार्रवाई करनी होगी।
- म्यूज़िकल इंस्ट्रूमेंट के तौर पर सिलेंडरों (ढोल समूहों द्वारा) के इस्तेमाल पर भी रोक लगाई जाएगी।
बेंच ने पुलिस अधिकारियों से यह भी कहा कि वे मंडलों पर एक निश्चित राशि "सिक्योरिटी डिपॉज़िट" के तौर पर जमा करने की शर्त लागू करें, ताकि शोर प्रदूषण नियमों का उल्लंघन होने पर उस राशि को जुर्माने के तौर पर ज़ब्त किया जा सके।
अदालत ने मौखिक रूप से कहा,
"इन मंडलों के पास पैसे की कोई कमी नहीं है... सिक्योरिटी डिपॉज़िट की यह शर्त इन मंडलों के लिए एक रोक (Deterrent) का काम करेगी... यह 'प्रदूषण फैलाने वाला ही भुगतान करेगा' (Polluter Pays) के सिद्धांत पर आधारित होगी।"
बेंच ने यह भी बताया कि हर साल जून में होने वाले 'वारी' (Wari) धार्मिक जुलूस में हज़ारों लोग शामिल होते हैं और वे शोर प्रदूषण नहीं फैलाते हैं।
बेंच ने कहा,
"वे ताल (मंजीरे या हाथ के झांझ) का इस्तेमाल करते हैं और गाने गाते हैं... लेकिन वे कभी किसी को परेशान नहीं करते और इससे ज़रा भी शोर-शराबा या ध्वनि प्रदूषण नहीं होता... नागरिकों को उनसे सीखना चाहिए... हम बस इतना चाहते हैं कि ज़िम्मेदार नागरिक समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को समझें; हम न तो कुछ नया जोड़ रहे हैं और न ही कोई नया कानून वगैरह बना रहे हैं। हम किसी भी धार्मिक जुलूस या जश्न के ख़िलाफ़ नहीं हैं... जश्न ज़रूर मनाएं, लेकिन कानून के दायरे में रहकर।"
सुनवाई के दौरान, महाराष्ट्र के एडवोकेट जनरल डॉ. साठे ने जजों को बताया कि पुलिस सिर्फ़ जुलूस निकालने की इजाज़त देती है, न कि लाउडस्पीकर, डीजे, ढोल या पटाखे फोड़ने की। इनके लिए अलग से इजाज़त लेनी पड़ती है। उन्होंने जजों को यह भी बताया कि ज़्यादा से ज़्यादा ढोल/बैंड बजाने की इजाज़त दी जाती है, लेकिन पटाखे फोड़ने की नहीं।
AG ने आगे कहा कि पटाखों पर पूरी तरह से रोक नहीं है, लेकिन पुलिस इनके इस्तेमाल की इजाज़त नहीं देती। उन्होंने ध्वनि प्रदूषण नियमों के प्रावधानों का ज़िक्र किया, जिनमें "साइलेंस ज़ोन" (शांत क्षेत्र) बताए गए - जैसे अस्पताल, अदालतें, स्कूल, कॉलेज, धार्मिक स्थल वगैरह।
इस पर कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि गणेश मंडलों को भी "धार्मिक स्थल" माना जा सकता है। हालांकि, AG ने कहा कि किसी जगह को साइलेंस ज़ोन घोषित करने के लिए उसकी आधिकारिक अधिसूचना (नोटिफिकेशन) जारी होनी चाहिए।
सोमवार को कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को यह बताने का आदेश दिया कि उसने धार्मिक जुलूसों के दौरान डीजे से होने वाले ध्वनि प्रदूषण को रोकने के लिए क्या कदम उठाए हैं। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि गणेश चतुर्थी के मौजूदा त्योहार के दौरान, डीजे आधी रात के बाद भी बजते रहे, जिससे स्थानीय निवासियों को ध्वनि प्रदूषण का सामना करना पड़ा।
गौर करने वाली बात है कि इसी तरह के मुद्दे पर जनहित याचिका (PIL) पहले से ही चीफ जस्टिस महेश चंद्र त्रिपाठी की अध्यक्षता वाली हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच के सामने लंबित है।

