केंद्र सरकार के कंट्रोल वाले बैंक के कर्मचारी से जुड़े इंडस्ट्रियल विवाद पर राज्य लेबर कोर्ट सुनवाई कर सकता है: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट
Shahadat
29 Sept 2026 2:07 PM IST

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि कोई कर्मचारी इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट, 1947 की धारा 2-A(2) के तहत राज्य सरकार द्वारा बनाए गए इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल-कम-लेबर कोर्ट में जा सकता है, अगर इंडस्ट्रियल विवाद ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र (टेरिटोरियल ज्यूरिस्डिक्शन) के अंदर आता है।
ऐसा करते हुए कोर्ट ने गुंटूर लेबर कोर्ट का वह आदेश रद्द किया, जिसमें विवाद पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया गया था। कोर्ट ने यह तर्क दिया कि बैंक के लिए केंद्र सरकार ही सही अथॉरिटी (एप्रोप्रिएट गवर्नमेंट) है, इसलिए विवाद को केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए लेबर कोर्ट के सामने लाया जाना चाहिए।
इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट, 1947 की धारा 2-A (2) किसी कर्मचारी को, जिसे नौकरी से निकाला गया हो, हटाया गया हो या जिसकी छंटनी की गई हो, सीधे लेबर कोर्ट जाने की इजाज़त देती है। इसके लिए सही अथॉरिटी (एप्रोप्रिएट गवर्नमेंट) से पहले से रेफरेंस लेने की ज़रूरत नहीं होती।
याचिका को सुनवाई के योग्य मानते हुए जस्टिस बालाजी मेदामल्ली की सिंगल जज बेंच ने कहा:
इस कोर्ट का मानना है कि चूंकि विवाद गुंटूर के इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल-कम-लेबर कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में पैदा हुआ। इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट, 1947 के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए याचिकाकर्ता द्वारा राज्य सरकार द्वारा बनाए गए इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल के सामने दायर की गई अर्ज़ी सुनवाई योग्य है। इसलिए ट्रिब्यूनल को विवाद पर सुनवाई करने और फैसला करने का अधिकार है। इसी के अनुसार, गुंटूर के इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल के चेयरमैन और लेबर कोर्ट के पीठासीन अधिकारी (प्रिसाइडिंग ऑफिसर) द्वारा इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट नंबर 24/2013 में 01.02.2021 को पारित आदेश, और लेबर, फैक्ट्रीज़, बॉयलर्स और इंश्योरेंस मेडिकल सर्विसेज़ (OP) डिपार्टमेंट द्वारा जारी G.O.Rt.No. 118 (दिनांक 22.04.2021) के तहत अधिसूचित आदेश रद्द किया जाता है। इस आदेश में विवाद के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी गई।”
यह विवाद स्टेट बैंक ऑफ़ हैदराबाद (जो अब अस्तित्व में नहीं है) की नौकरी से याचिकाकर्ता को हटाए जाने के कारण शुरू हुआ। उन्होंने 2004 में बैंक में स्वीपर-कम-लंच रूम अटेंडेंट (SWLRA) के तौर पर काम शुरू किया।
कुछ समय तक बहुत कम वेतन पर काम करने के बाद उन्हें सब-स्टाफ पे-स्केल यानी क्लास IV कैटेगरी में वन-थर्ड SWLRA के तौर पर रेगुलर कर दिया गया। उनके कामों में बैंक परिसर की सफाई करना, फाइलें इधर-उधर ले जाना और स्टाफ को चाय-नाश्ता परोसना शामिल है।
2012 में बैंक ने उन्हें एक नोटिस जारी कर आरोप लगाया कि उन्होंने गलत तरीके से नौकरी हासिल की। उनके बैकग्राउंड की जांच के दौरान मामला पुलिस को सौंपा गया, जिसने रिपोर्ट दी कि उनके द्वारा पेश किया गया ट्रांसफर सर्टिफिकेट (जो कथित तौर पर महात्मा गांधी मेमोरियल स्कूल द्वारा जारी किया गया) असली नहीं है।
याचिकाकर्ता ने आरोप से इनकार किया और अपना स्पष्टीकरण दिया। इसके बाद अनुशासनात्मक जांच की गई। उन्होंने तर्क दिया कि उनके स्पष्टीकरण पर ठीक से विचार नहीं किया गया और जांच के दौरान इकट्ठा किए गए दस्तावेज और सामग्री उन्हें नहीं दिए गए, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन था। जांच रिपोर्ट के आधार पर, बैंक ने उन्हें नौकरी से हटा दिया।
नौकरी से हटाए जाने से दुखी होकर वह लेबर कोर्ट गईं। हालांकि, लेबर कोर्ट ने मामले के गुण-दोष के आधार पर विवाद का निपटारा करने से इनकार किया। कोर्ट का कहना था कि बैंक के मामले में केंद्र सरकार ही उचित सरकार थी, जबकि लेबर कोर्ट का गठन राज्य सरकार ने किया। इसलिए कोर्ट ने विवाद को उचित फोरम के समक्ष पेश करने के लिए वापस किया।
इस आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता हाईकोर्ट गईं।
हाईकोर्ट के समक्ष उन्होंने तर्क दिया कि धारा 2-A(2) उन्हें ट्रिब्यूनल-कम-लेबर कोर्ट के समक्ष सीधे उपाय का अधिकार देती है और विवाद का निपटारा उस ट्रिब्यूनल द्वारा किया जा सकता है जिसके अधिकार क्षेत्र में संस्थान स्थित है।
दूसरी ओर, प्रतिवादियों का कहना था कि चूंकि बैंक केंद्र सरकार के नियंत्रण में था, इसलिए याचिकाकर्ता को केंद्र सरकार द्वारा गठित लेबर कोर्ट में जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा गठित ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र पर उठाई गई आपत्ति को खारिज किया।
विजया बैंक बनाम श्यामल कुमार लोद (2010) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने माना कि राज्य सरकार द्वारा गठित ट्रिब्यूनल के सामने याचिकाकर्ता की अर्ज़ी सुनवाई योग्य थी, क्योंकि विवाद उसके अधिकार क्षेत्र के दायरे में ही पैदा हुआ था।
इसके अनुसार, कोर्ट ने लेबर कोर्ट का आदेश रद्द किया और मामले को कानून के मुताबिक गुण-दोष के आधार पर नए सिरे से विचार और निपटारे के लिए वापस भेज दिया।
कोर्ट ने साफ़ किया कि उसने याचिकाकर्ता द्वारा अपनी बर्खास्तगी को चुनौती देने के मामले के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी।
इस प्रकार, रिट याचिका मंज़ूर की गई।
Case Title: Chennupalli Seetha v. State Bank of Hyderabad & Others

