माता-पिता के साथ खुशी-खुशी रह रही बालिग महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप का दावा करने वाला व्यक्ति 'हेबियस कॉर्पस' याचिका दायर नहीं कर सकता: एपी हाईकोर्ट
Shahadat
28 July 2026 8:42 PM IST

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि माता-पिता के साथ रह रही बालिग महिला के साथ रिश्ते का दावा करने वाले व्यक्ति की ओर से 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) की रिट याचिका तब तक स्वीकार्य नहीं है, जब तक कि यह दिखाने के लिए कोई शुरुआती सबूत (Prima Facie Material) न हो कि उसे गैर-कानूनी तरीके से कैद करके रखा गया।
कोर्ट ने कहा कि माता-पिता के घर में अपनी माँ और भाई के साथ रह रही बेटी को आम तौर पर गैर-कानूनी कैद नहीं माना जा सकता।
'हेबियस कॉर्पस' याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि रिश्ते का सबूत देने वाली तस्वीरें और व्हाट्सएप चैट - जिनमें महिला को उसकी मर्जी के खिलाफ कैद रखने का कोई संकेत नहीं था - रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने के लिए काफी नहीं थे।
जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस सुभेंदु सामंता की डिवीजन बेंच ने रिट याचिका खारिज की।
कोर्ट ने कहा:
"याचिकाकर्ता और कथित तौर पर कैद महिला शायद किसी रिश्ते में रहे हों या रह रहे हों और भविष्य में शादी करने का इरादा रखते हों, लेकिन सिर्फ़ इसी आधार पर 'हेबियस कॉर्पस' याचिका दायर करने का अधिकार नहीं मिल जाता, जब तक कि कोर्ट के सामने पेश किए गए सबूतों से यह निष्कर्ष न निकले कि गैर-कानूनी कैद हुई।
हम 'हेबियस कॉर्पस' रिट याचिका दायर करने के अधिकार (Locusa Standi) से जुड़े कानून से अनजान नहीं हैं, लेकिन जब माता-पिता के साथ रह रही लड़की को पेश करने या रिहा करने की बात आती है और रिट याचिका ऐसे व्यक्ति द्वारा दायर की जाती है, जो बॉयफ्रेंड होने या 'लिव-इन रिलेशनशिप' में होने का दावा करता है तो 'हेबियस कॉर्पस' रिट जारी करने के लिए ज़रूरी बुनियादी बातों की सावधानीपूर्वक और सख्ती से जांच की जानी चाहिए।"
याचिकाकर्ता ने 'हेबियस कॉर्पस' रिट के ज़रिए 22 साल की महिला की रिहाई की मांग की थी और आरोप लगाया कि उसे उसकी माँ और भाई ने गैर-कानूनी तरीके से कैद कर रखा है। उसने तस्वीरों और व्हाट्सएप संदेशों के आधार पर तर्क दिया कि वे आपसी सहमति से रिश्ते में थे और भविष्य में साथ रहना चाहते थे।
रिकॉर्ड पर रखे गए सबूतों की जांच करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि न तो तस्वीरों और न ही व्हाट्सएप बातचीत से यह संकेत मिलता है कि महिला को जबरन रोका गया या वह अपना पैतृक घर छोड़ना चाहती थी। कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई शुरुआती सबूत नहीं मिला, जिससे पता चले कि अपनी माँ और भाई के साथ उसका रहना उसकी मर्जी के खिलाफ था।
बेंच ने फिर से कहा कि 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) की रिट के लिए ज़रूरी शर्त गैर-कानूनी हिरासत है और भले ही समय के साथ इस रिट का दायरा बढ़ा है, लेकिन गैर-कानूनी तरीके से रोके जाने को साबित करने वाले ठोस सबूतों के बिना इसे लागू नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी कहा,
"याचिकाकर्ता 'हेबियस कॉर्पस' की रिट का सहारा लेकर हिरासत में रखी गई महिला के साथ रिश्ते में रहने के अपने अधिकार का दावा नहीं कर सकता"।
कोर्ट ने यह भी पाया कि हिरासत में रखी गई महिला के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकारों के उल्लंघन या उसकी माँ और भाई द्वारा किसी भी गैर-कानूनी हिरासत को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूतों के साथ कोई ठोस आधार मौजूद नहीं था।
यह देखते हुए कि 'हेबियस कॉर्पस' अधिकार की रिट तो है, लेकिन इसे सामान्य तौर पर जारी नहीं किया जा सकता, हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की। साथ ही याचिकाकर्ता के लिए कानून के तहत उपलब्ध किसी अन्य उपाय को अपनाने का रास्ता खुला रखा।
Case Title: Mogal Shuaibulla Baig v. State of Andhra Pradesh & Ors.


