नजरबंद व्यक्ति की रिहाई संबंधी अर्जी पर बिना वजह देरी करना असंवैधानिक, इससे हिरासत अवैध हो जाती है: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट
Amir Ahmad
7 Aug 2026 1:17 PM IST

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने व्यक्ति के निवारक निरुद्धीकरण (प्रिवेंटिव डिटेंशन) रद्द करते हुए कहा कि यदि सरकार नजरबंद व्यक्ति की रिहाई संबंधी अर्जी पर बिना उचित कारण के देरी से निर्णय लेती है, तो उसकी आगे की हिरासत अवैध हो जाती है।
जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस शुभेंदु सामंत की खंडपीठ ने यह फैसला नजरबंद व्यक्ति की पत्नी द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका पर सुनाया। याचिका में आंध्र प्रदेश खतरनाक गतिविधियों की रोकथाम अधिनियम, 1986 के तहत जारी निरुद्धीकरण आदेश को चुनौती दी गई।
नजरबंदी का आदेश व्यक्ति के खिलाफ दर्ज आठ आपराधिक मामलों के आधार पर जारी किया गया था, जिसे बाद में राज्य सरकार ने मंजूरी और पुष्टि भी दी थी।
हाईकोर्ट ने कहा,
"व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में प्रतिनिधित्व पर शीघ्र निर्णय लिया जाना चाहिए। अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता एक मौलिक अधिकार है और किसी व्यक्ति को केवल कानून के अनुसार ही इससे वंचित किया जा सकता है। यदि निर्णय में देरी होती है, तो उसका संतोषजनक और उचित कारण होना चाहिए।"
अदालत ने पाया कि जिला कलेक्टर की टिप्पणी प्राप्त होने के बाद भी सरकार ने प्रतिनिधित्व पर निर्णय लेने में 32 दिन का समय लगा दिया। इसके अलावा, कलेक्टर से टिप्पणी मंगाने और उसे प्राप्त करने में भी काफी देरी हुई।
खंडपीठ ने कहा कि इतनी लंबी देरी पूरी तरह अनुचित है। इसका कोई स्पष्टीकरण न तो प्रतिनिधित्व खारिज करने वाले आदेश में दिया गया और न ही अदालत में दाखिल जवाबी हलफनामे में।
याचिकाकर्ता का कहना था कि नजरबंद व्यक्ति ने अक्टूबर 2025 में अपनी रिहाई के लिए प्रतिनिधित्व दिया, लेकिन राज्य सरकार ने उसे जनवरी 2026 में जाकर खारिज किया। इस अनुचित और अस्पष्टीकृत देरी के कारण उसकी निरंतर हिरासत असंवैधानिक हो गई।
राज्य सरकार ने स्वीकार किया कि प्रतिनिधित्व मिलने के बाद उसे जिला कलेक्टर की टिप्पणी के लिए भेजा गया और टिप्पणी मिलने के बाद ही निर्णय लिया गया। हालांकि, सरकार यह नहीं बता सकी कि विभिन्न चरणों में हुई देरी का कारण क्या था।
हाईकोर्ट ने दोहराया कि यद्यपि कानून में प्रतिनिधित्व पर निर्णय लेने की कोई निश्चित समय-सीमा नहीं है, फिर भी सरकार का संवैधानिक दायित्व है कि वह ऐसे मामलों का शीघ्र निस्तारण करे।
अदालत ने कहा कि बिना किसी उचित कारण के देरी संविधान के अनुच्छेद 21 और 22(5) का उल्लंघन है और इससे नजरबंद व्यक्ति की आगे की हिरासत अवैध हो जाती है।
चूंकि केवल इसी आधार पर याचिका स्वीकार की जा सकती थी, इसलिए अदालत ने उस अन्य दलील पर विचार नहीं किया, जिसमें कहा गया कि निरुद्धीकरण आदेश पारित करते समय प्राधिकारी ने यह संतोष दर्ज नहीं किया कि न्यायिक हिरासत में होने के बावजूद संबंधित व्यक्ति के जमानत पर छूटने की संभावना थी।
हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि संबंधित व्यक्ति किसी आपराधिक मामले में अब भी न्यायिक हिरासत में है तो इस आदेश के आधार पर उसे उस मामले में रिहा नहीं किया जाएगा।
अंततः अदालत ने निरुद्धीकरण और उसकी पुष्टि संबंधी आदेश रद्द करते हुए नजरबंद व्यक्ति को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया।
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