सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में 'गरीब कैदियों की सहायता' (Support to Poor Prisoners) योजना के लिए केंद्र की स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) का पालन न किए जाने का मुद्दा उठाया। कोर्ट ने सभी राज्यों को निर्देश दिया कि वे यह सुनिश्चित करें कि ज़िला स्तरीय अधिकार प्राप्त कमेटियां (DLECs) नियमित रूप से बैठकें करें और रिहाई पर विचार के लिए उनके सामने रखे गए विचाराधीन कैदियों के मामलों पर समय पर निर्णय लें।

कोर्ट ने निर्देश दिया,

"हमने इस बात पर भी ध्यान दिया है कि ज़िला स्तरीय अधिकार प्राप्त कमेटियों (DLECs) की बैठकें नियमित रूप से नहीं हो रही हैं, जैसा कि 02.12.2025 की संशोधित SOP में अनिवार्य किया गया। इसलिए यह निर्देश दिया जाता है कि सभी DLECs नियमित रूप से बैठकें करें, जैसा कि अनिवार्य है, और उन मामलों पर भी निर्णय लें जो उनके समक्ष विचार के लिए लंबित हैं। उपरोक्त निर्देशों का पालन किया जाना चाहिए और सुनवाई की अगली तारीख से पहले विद्वान एमिकस (Amicus) को इसकी रिपोर्ट दी जानी चाहिए।"

जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच 'सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन 2022 LiveLaw (SC) 577' के मुख्य मामले से जुड़ी एक विविध याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस मामले में कोर्ट ने पात्र विचाराधीन कैदियों की रिहाई के लिए एक सिस्टम बनाने का निर्देश दिया था ताकि उन्हें अनावश्यक रूप से हिरासत में न रखा जाए।

रिहाई के लिए बॉन्ड भरने के लिए पैसे की कमी के कारण जेल में बंद विचाराधीन कैदियों की मदद के लिए केंद्र ने "गरीब कैदियों की सहायता" योजना शुरू की। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी कैदी केवल आर्थिक तंगी के कारण जेल में न रहे।

इस योजना के तहत, जिसे कोर्ट ने 3 दिसंबर, 2025 को रिकॉर्ड पर लिया, ज़िला स्तरीय अधिकार प्राप्त कमेटियां (DLECs) बनाई गईं। इनका काम विचाराधीन कैदियों के मामलों की जांच करना और निर्धारित दिशानिर्देशों व संशोधित स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) के अनुसार उनकी रिहाई की पात्रता पर विचार करना था।

18 अगस्त, 2026 को हुई नवीनतम सुनवाई के दौरान, मामले में सीनियर वकील और एमिक्स क्यूरी (Amicus Curiae) सिद्धार्थ लूथरा ने कोर्ट का ध्यान कमेटी के निर्देशों और सुझावों का पालन न किए जाने की घटनाओं की ओर आकर्षित किया, खासकर पंजाब और महाराष्ट्र के संबंध में।

कोर्ट को यह भी बताया गया कि कई मामलों में DLEC की बैठकें नियमित रूप से नहीं हो रही हैं और मामले बिना किसी फैसले के लंबित पड़े हैं। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा कोर्ट के सामने पेश किए गए आंकड़ों से पता चला कि बैठकें होने के बावजूद DLEC के पास कई मामले लंबित हैं।

कोर्ट ने यह भी गौर किया कि कुछ मामलों में विचाराधीन कैदियों की रिहाई पर विचार करने में देरी हो रही है, क्योंकि संबंधित जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों (DLSA) से वित्तीय/सामाजिक स्थिति रिपोर्ट नहीं मिली।

कोर्ट ने कहा,

"NALSA को निर्देश दिया जाता है कि वह यह सुनिश्चित करे कि सभी DLSA उचित कदम उठाएं ताकि वित्तीय/सामाजिक स्थिति रिपोर्ट न मिलने के कारण मामले लंबित न रहें।"

इस स्थिति को देखते हुए कोर्ट ने निर्देश जारी किए ताकि पात्र विचाराधीन कैदियों की रिहाई पर विचार करने के लिए बनाया गया तंत्र प्रभावी ढंग से और बिना किसी अनावश्यक प्रशासनिक देरी के काम करे।

उपर्युक्त निर्देश के अनुपालन की रिपोर्ट अगली सुनवाई की तारीख, यानी 06.10.2026 को कोर्ट के समक्ष पेश करने का निर्देश दिया गया।

Cause Title: SATENDER KUMAR ANTIL VERSUS CENTRAL BUREAU OF INVESTIGATION & ANR.

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