टैक्स क्लासिफिकेशन सामान के बिक्री के समय के रूप पर आधारित होना चाहिए, न कि उसके अंतिम इस्तेमाल पर: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पाउडर या बिस्किट के रूप में बेचे जाने वाले सामान को सिर्फ़ इसलिए "नॉन-अल्कोहलिक ड्रिंक्स और बेवरेज" (बिना शराब वाले पेय पदार्थ) के तौर पर क्लासिफ़ाई नहीं किया जा सकता, क्योंकि बाद में उन्हें दूध या पानी में मिलाकर पेय पदार्थ बनाया जा सकता है।
जस्टिस मनमोहन और जस्टिस अरुण पल्ली की बेंच ने इस मुद्दे पर विचार किया कि क्या सामान को उनके अंतिम इस्तेमाल के आधार पर क्लासिफ़ाई किया जाना चाहिए (यानी, उन्हें दूध या पानी में मिलाकर पेय पदार्थ बनाया जा सकता है) या बिक्री के समय उनके रूप के आधार पर।
इस मुद्दे का जवाब देते हुए कोर्ट ने कहा कि टैक्स क्लासिफिकेशन के मकसद से बिक्री के समय सामान का रूप ही निर्णायक होता है और ग्राहकों द्वारा बाद में किए गए इस्तेमाल से टैक्स क्लासिफिकेशन नहीं बदला जा सकता ताकि ग्राहक पर ज़्यादा टैक्स लगाया जा सके।
यह मामला तब शुरू हुआ, जब रेवेन्यू विभाग ने रेस्पॉन्डेंट-कैडिला हेल्थ केयर के प्रोडक्ट्स 'GRD पाउडर' और 'GRD मिक्स' को पेय पदार्थ माना। उनका तर्क था कि पाउडर का अंतिम इस्तेमाल ग्राहक द्वारा तरल पदार्थ के रूप में सेवन करना होगा, चाहे प्रोडक्ट का मूल रूप पाउडर हो या बिस्किट।
रेवेन्यू विभाग ने तर्क दिया कि इन सामानों को एमपी कमर्शियल टैक्स एक्ट, 1994 के शेड्यूल II, पार्ट IV, एंट्री 20(ii) के तहत 'नॉन-अल्कोहलिक ड्रिंक्स और बेवरेज' के तौर पर क्लासिफ़ाई किया जा सकता है, जिस पर 10% टैक्स लगता है।
हालांकि, रेस्पॉन्डेंट ने तर्क दिया कि पाउडर और बिस्किट के रूप में काउंटर पर बेचे जाने वाले इन सामानों पर रेजिडुअरी एंट्री (बची हुई एंट्री) के तहत 8% टैक्स लगना चाहिए।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अपने फैसले में 1994 के एक्ट के शेड्यूल II की रेजिडुअरी एंट्री के तहत सामान के क्लासिफिकेशन को सही ठहराया और असेसमेंट ईयर 1997-1998 के लिए उन पर 8% टैक्स लगाया। इससे असंतुष्ट होकर रेवेन्यू विभाग ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
जस्टिस मनमोहन के लिखे फैसले में अपील खारिज करते हुए विवादित आदेश सही ठहराया गया। इसमें कहा गया कि टैक्स लगाने की घटना सप्लाई का काम है और टैक्स का बोझ इस बात से तय होता है कि सामान किस रूप में बेचा जा रहा है।
कोर्ट ने कहा,
"टैक्स अधिकारियों को बिक्री के समय सामान के रूप के आधार पर टैक्स लगाना होता है। टैक्स अधिकारियों को यह देखना होता है कि क्या सप्लाई किया जा रहा है, न कि यह कि सामान का 'आखिरी इस्तेमाल' क्या है।"
कोर्ट ने इस सिद्धांत को समझाते हुए कहा कि अगर प्रोटीन पाउडर को पाउडर के रूप में बेचा जाता है तो पाउडर पर लागू होने वाला टैक्स लगेगा। दूसरी ओर, अगर पीने के लिए तैयार ड्रिंक जैसे बोतलबंद कोल्ड कॉफी या पैक्ड प्रोटीन शेक बेचा जाता है, तो उस पर ड्रिंक्स (पेय पदार्थों) पर लागू होने वाला टैक्स लगेगा।
कोर्ट ने गौर किया कि "पेय पदार्थों" (Beverages) के साथ बताई गई खास चीजें, जैसे सिरप, कॉर्डियल, डिस्टिल्ड जूस, अर्क और एसेंस, सभी लिक्विड या लिक्विड से बनी चीजें हैं।
कोर्ट के अनुसार, इन प्रोडक्ट्स में एक बात समान है कि ये लिक्विड पदार्थ हैं, जिन्हें बोतल में भरा जा सकता है, स्टोर किया जा सकता है और लिक्विड रूप में पिया या इस्तेमाल किया जा सकता है।
इसलिए "पेय पदार्थों" शब्द का मतलब अलग-थलग करके ऐसे प्रोडक्ट्स को शामिल करने के लिए नहीं निकाला जा सकता जिनका फिजिकल रूप पूरी तरह से अलग हो।
रेवेन्यू विभाग ने रसना, चाय और शरबत जैसे प्रोडक्ट्स से जुड़े पुराने फैसलों का हवाला दिया था। पियोमा इंडस्ट्रीज बनाम केरल राज्य (2008) मामले में, जो रसना से जुड़ा है, संबंधित एंट्री में ही एक स्पष्टीकरण है, जिसमें नॉन-अल्कोहलिक ड्रिंक्स बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले पाउडर, टैबलेट और कॉन्संट्रेट को खास तौर पर शामिल किया गया।
कोर्ट ने गौर किया कि इसलिए लेजिस्लेचर को पता है कि पाउडर को नॉन-अल्कोहलिक पेय पदार्थों की कैटेगरी में साफ तौर पर शामिल किया जा सकता है, लेकिन मौजूदा एंट्री में ऐसी भाषा का इस्तेमाल नहीं किया गया।
कोर्ट ने हमदर्द (वक्फ) लेबोरेटरीज बनाम कमिश्नर, कमर्शियल टैक्स, यूपी 2026 LiveLaw (SC) 197 में अपने हालिया फैसले से भी अंतर बताया। कोर्ट ने कहा कि उस मामले में शामिल शरबत लिक्विड रूप में था, जबकि अभी कोर्ट के सामने मौजूद प्रोडक्ट्स अलग हैं। कोर्ट ने आगे यह भी साफ़ किया कि टैक्स लगाने वाली एंट्री में “Including” (जिसमें शामिल है) शब्द को अपने-आप में ऐसा व्यापक शब्द नहीं माना जा सकता जो पेय पदार्थों से दूर-दूर तक जुड़े हर उत्पाद को कवर कर सके।
नतीजतन, अपील खारिज कर दी गई।
Case Title : ADDL. COMMR. COMMERCIAL TAX & ORS. VERSUS CADILA HEALTH CARE LTD & ANR.