स्कूल में निर्माणाधीन पिलर गिरने से 12 वर्षीय छात्रा की मौत: सुप्रीम कोर्ट ने स्कूल अध्यक्ष और अधीक्षक के खिलाफ आपराधिक केस किया रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के अमरावती जिले के एक आश्रम स्कूल में निर्माणाधीन पिलर गिरने से 12 वर्षीय छात्रा की मौत के मामले में स्कूल के अध्यक्ष और अधीक्षक के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। कोर्ट ने कहा कि कानून द्वारा निर्धारित सावधानी के मानक का पालन करने में विफलता मात्र से कोई कृत्य आपराधिक नहीं हो जाता।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनमोहन की खंडपीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द करते हुए यह फैसला सुनाया, जिसमें स्कूल अध्यक्ष और अधीक्षक के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया गया था।
क्या था मामला?
यह घटना 15 फरवरी 2020 को महाराष्ट्र के अमरावती जिले के एक आश्रम स्कूल में हुई थी। स्कूल में सातवीं कक्षा में पढ़ने वाली 12 वर्षीय छात्रा के ऊपर परिसर में निर्माणाधीन एक पिलर गिर गया, जिससे उसे गंभीर चोटें आईं और उसकी मौत हो गई।
मृतक छात्रा के पिता ने शिकायत दर्ज कराते हुए आरोप लगाया कि स्कूल के निदेशक और हॉस्टल अधीक्षक ने पिलर का घटिया और मानकविहीन निर्माण कराया तथा निर्माण के दौरान आवश्यक सावधानियां नहीं बरतीं।
इसके बाद स्कूल के पदाधिकारियों के खिलाफ IPC की धारा 304 (गैर इरादतन हत्या) और धारा 34 (समान आशय) के तहत आरोप लगाए गए।
स्कूल अध्यक्ष और अधीक्षक ने आपराधिक कार्यवाही रद्द कराने के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया, लेकिन हाईकोर्ट ने केमिकल एनालाइजर की रिपोर्ट और घटनास्थल के पंचनामे का हवाला देते हुए उनकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि IPC की धारा 304 के तहत दायित्व तय करने के लिए आरोपी की ओर से मृत्यु कारित करने का इरादा या ऐसा ज्ञान होना आवश्यक है कि उसके कृत्य से मृत्यु होने की पूरी संभावना है। वहीं, धारा 304A के तहत आपराधिक लापरवाही साबित करने के लिए केवल सामान्य लापरवाही पर्याप्त नहीं है।
पीठ ने कहा:
“कानून द्वारा निर्धारित सावधानी के मानक को पूरा करने में विफलता और इस तरह कर्तव्य का उल्लंघन करना अपने आप में आपराधिक कृत्य नहीं होगा।”
कोर्ट ने कहा कि निर्माण कार्य ठेकेदार को सौंपा गया था। घटिया निर्माण से दुर्घटना या जनहानि होने की संभावना की जानकारी ठेकेदार को हो सकती थी, लेकिन केवल इस आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि स्कूल के पदाधिकारियों को भी यह ज्ञान था कि घटिया निर्माण से किसी छात्र की मृत्यु होने की पूरी संभावना है।
धारा 304A IPC के तहत भी नहीं बनता मामला
धारा 304A IPC के तहत आपराधिक दायित्व पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मृत्यु आरोपी के जल्दबाजी या लापरवाही भरे कृत्य का प्रत्यक्ष और निकटतम परिणाम होनी चाहिए। साथ ही, वह कृत्य मृत्यु का प्रभावी और निकटतम कारण होना चाहिए तथा बीच में किसी अन्य की लापरवाही से कारणों की श्रृंखला नहीं टूटनी चाहिए।
इस संदर्भ में पीठ ने Kurban Hussein Mohamedalli Rangawalla v. State of Maharashtra और Jacob Mathew v. State of Punjab सहित पूर्व फैसलों का उल्लेख किया।
कोर्ट ने कहा कि वर्तमान मामले में भले ही स्कूल प्रबंधन की ओर से उचित सावधानी नहीं बरतने की बात मान ली जाए, लेकिन छात्रा की मौत को उनकी कथित लापरवाही का प्रत्यक्ष और निकटतम परिणाम नहीं माना जा सकता।
पीठ ने कहा कि निर्माण कार्य वास्तव में ठेकेदार और उसकी टीम द्वारा किया जा रहा था। यदि ठेकेदार ने छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए थोड़ी भी सावधानी बरती होती, तो संभवतः यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना टाली जा सकती थी।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्कूल पदाधिकारियों की कथित लापरवाही को causa causans यानी मृत्यु का प्रत्यक्ष और प्रभावी कारण नहीं माना जा सकता, हालांकि वह causa sine qua non यानी ऐसी परिस्थिति हो सकती है जिसके बिना घटना नहीं होती।
ठेकेदार की भूमिका पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
पीठ ने कहा कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर यदि किसी व्यक्ति को प्रथम दृष्टया छात्रा की दुर्भाग्यपूर्ण मौत के लिए जिम्मेदार माना जा सकता है, तो वह ठेकेदार हो सकता है। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह टिप्पणी प्रथम दृष्टया है और यदि ठेकेदार भी आरोपी है तो मुकदमे के दौरान पेश किए जाने वाले साक्ष्यों के अधीन होगी।
12 वर्षीय बच्ची की मौत पर कोर्ट ने जताया दुख
फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने घटना पर गहरा दुख व्यक्त किया। पीठ ने कहा:
“अपने ही स्कूल के एक पिलर के नीचे 12 वर्षीय बच्ची के कुचलकर मरने की कल्पना मात्र से हमारा हृदय पीड़ा और वेदना से भर जाता है। हम यह भी कल्पना कर सकते हैं कि मृत बच्ची के माता-पिता आज भी किस पीड़ा से गुजर रहे होंगे।”
हालांकि, कोर्ट ने कहा कि न्याय करते समय ऐसी भावनाओं को न्यायिक विवेक पर हावी नहीं होने दिया जा सकता। कानून भले ही कठोर लगे, लेकिन कानून का सम्मान करना आवश्यक है।
इन टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली और चार्जशीट से उत्पन्न आपराधिक कार्यवाही को स्कूल अध्यक्ष और अधीक्षक के खिलाफ रद्द कर दिया।
हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि अन्य सह-आरोपियों के खिलाफ मुकदमा कानून के अनुसार जारी रह सकता है।