तथ्यों की दोबारा जांच के लिए Revisional Jurisdiction का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 115 के तहत Revisional Jurisdiction का इस्तेमाल केवल तथ्यों या कानून की सामान्य त्रुटियों को सुधारने के लिए नहीं किया जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक कोई क्षेत्राधिकार संबंधी (Jurisdictional) त्रुटि न हो, हाईकोर्ट निचली अदालतों के तथ्यों संबंधी निष्कर्षों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें हाईकोर्ट ने रेंट कंट्रोलर और अपीलीय प्राधिकरण (Appellate Authority) द्वारा पारित बेदखली (Eviction) के आदेशों को अपनी Revisional Jurisdiction का प्रयोग करते हुए पलट दिया था।
मामला एक किरायेदारी विवाद से जुड़ा था। रेंट कंट्रोलर और अपीलीय प्राधिकरण दोनों ने माना था कि मकान मालकिन को अपने बेटे के व्यवसाय के लिए दुकान की वास्तविक आवश्यकता (Bona Fide Requirement) है और किरायेदार ने बकाया किराया भी वैध रूप से जमा नहीं किया था। इसलिए दोनों प्राधिकरणों ने बेदखली का आदेश दिया।
हालांकि, हाईकोर्ट ने यह कहते हुए आदेश पलट दिया कि मकान मालकिन ने एक तीसरी दुकान के अस्तित्व को छिपाया है और इसलिए वह 'Clean Hands' के साथ अदालत नहीं आई।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दोनों निचली अदालतें पहले ही यह तथ्यात्मक निष्कर्ष दे चुकी थीं कि तीसरी दुकान कचरा रखने के लिए इस्तेमाल हो रही थी, न कि वैकल्पिक व्यावसायिक स्थान के रूप में। ऐसे में हाईकोर्ट केवल अलग राय रखने के आधार पर उन निष्कर्षों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकता था।
अदालत ने दोहराया कि Revisional Jurisdiction, Appellate Jurisdiction के समान नहीं है। हाईकोर्ट केवल इसलिए तथ्यों के समवर्ती निष्कर्षों (Concurrent Findings of Fact) में हस्तक्षेप नहीं कर सकता कि उसे कोई दूसरा दृष्टिकोण अधिक उचित लगता है।
इन्हीं कारणों से सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए मकान मालकिन की अपील स्वीकार कर ली।