सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान की लूनी, जोजारी और बांडी नदियों में अवैध बजरी खनन की SIT जांच के आदेश दिए; नदी पारिस्थितिकी तंत्र के पास नए उद्योगों पर रोक लगाई
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार को निर्देश दिया कि वह तीन दिनों के भीतर विशेष जांच दल (SIT) का गठन करे। यह टीम लूनी, जोजारी और बांडी नदियों और उनकी सहायक नदियों में हो रहे संगठित अवैध बजरी खनन की जांच करेगी। इसमें सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत की भी जांच की जाएगी।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने 26 अक्टूबर के अपने आदेश में राज्य सरकार को निर्देश दिया कि जब तक 'हाई फ्लड लाइन' (अधिकतम बाढ़ स्तर) और 'बफर जोन' वैज्ञानिक तरीके से तय नहीं हो जाते, तब तक नदी पारिस्थितिकी तंत्र के पास या उसके आसपास किसी भी नए औद्योगिक इकाई को स्थापित करने की अनुमति न दी जाए।
SIT का नेतृत्व पुलिस महानिरीक्षक (IGP) रैंक के अधिकारी करेंगे। इसमें जोधपुर, बालोतरा और पाली के पुलिस अधीक्षक (SP) भी शामिल होंगे।
कोर्ट ने आदेश दिया,
"SIT लूनी, जोजारी और बांडी नदियों और उनकी सहायक नदियों को प्रभावित करने वाले संगठित अवैध बजरी खनन की व्यापक जांच करेगी। इस जांच में उन लोगों और संस्थाओं की पहचान की जाएगी, जो इन गतिविधियों में शामिल हैं। साथ ही उस नेटवर्क का भी पता लगाया जाएगा, जिसके जरिए बजरी का अवैध खनन, परिवहन और बिक्री की जाती है, और यह भी देखा जाएगा कि इस पूरे काम से किसे फायदा मिल रहा है।"
SIT को यह भी जांचना होगा कि क्या सरकारी अधिकारियों ने अवैध खनन में मदद की है—जैसे कि मिलीभगत करना, अपने कर्तव्यों का पालन न करना, या नियमों के उल्लंघन की जानकारी होने के बावजूद कोई कार्रवाई न करना। जो भी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ उचित कार्रवाई की जाएगी।
कोर्ट ने SIT को निर्देश दिया कि वह 27 नवंबर, 2026 को होने वाली अगली सुनवाई से पहले या उस दिन तक अपनी स्टेटस रिपोर्ट (स्थिति रिपोर्ट) कोर्ट में पेश करे।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि नदियों की दर्ज बाहरी सीमाओं के दोनों तरफ 100 मीटर का एक अतिरिक्त सुरक्षा क्षेत्र (Protective Zone) बनाए रखा जाए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन दर्ज बाहरी सीमाओं से 500 मीटर की दूरी के भीतर किसी भी 'रेड कैटेगरी' (अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाले) उद्योग को स्थापित करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
अदालत ने माना कि मौजूदा कार्यवाही से जुड़े मुद्दे जटिल और बहुआयामी हैं। इसलिए इन मुद्दों पर प्रभावी ढंग से विचार करने और उनके समाधान में अदालत की मदद के लिए सीनियर एडवोकेट बलबीर सिंह और 'एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड' नमित सक्सेना को 'एमिक्स क्यूरी' (न्याय मित्र) के रूप में नियुक्त किया गया।
अदालत ने जोजारी-लूनी-बांडी नदी प्रणाली में प्रदूषण से जुड़ी 'स्वतः संज्ञान' (suo motu) कार्यवाही में ये निर्देश जारी किए। इस प्रदूषण ने पर्यावरण और लगभग 20 लाख लोगों के जीवन को प्रभावित किया।
पिछली सुनवाई पर अदालत ने राजस्थान के अधिकारियों को चेतावनी दी थी कि जोजारी-लूनी-बांडी नदी प्रणाली के किनारे कथित अवैध खनन और खनन क्षेत्रों को नियमित (Regularize) करने के मामलों की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से कराई जा सकती है। अदालत ने सवाल किया कि राज्य के अधिकारियों ने उन इलाकों में खनन पट्टे (Leases) क्यों दिए, जहां पहले ही अवैध खनन पाया गया; और अवैध पट्टों को नियमित क्यों किया गया?
अदालत ने बाद में पट्टे देकर अवैध खनन को वैध बनाने की कोशिश की कड़ी आलोचना की।
अदालत ने राजस्थान खनन विभाग के उस स्पष्टीकरण पर गहरी चिंता जताई, जिसमें कहा गया कि जिन कई इलाकों में पहले अवैध बजरी खनन पाया गया, वहां बाद में निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन करते हुए खनन पट्टे दे दिए गए।
अदालत ने टिप्पणी की,
"भले ही बाद में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार खनन पट्टे (लीज़) दे दिए गए हों, लेकिन इससे यह सवाल हल नहीं होता कि क्या ऐसे पट्टे देना पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ है, या क्या यह नदी प्रणालियों के प्राकृतिक प्रवाह, नदी तल और पारिस्थितिक अखंडता को संरक्षित और बहाल करने की आवश्यकता के अनुरूप है।"
अदालत ने गौर किया कि जिम्मेदार लोगों के खिलाफ उचित कार्रवाई करने के बजाय अधिकारियों ने बाद में खनन पट्टे देकर अवैध खनन गतिविधियों को वैध बनाने की कोशिश की। अदालत ने कहा कि वह ऐसी गतिविधियों की अनुमति देने या उनमें मदद करने के लिए जिम्मेदार पाए जाने वाले अधिकारियों के खिलाफ उचित कार्रवाई का निर्देश देने पर विचार करेगी।
कोर्ट ने आगे कहा,
"हम राजस्थान राज्य के खनन विभाग के उस प्रयास की निंदा करते हैं, जिसमें नदी तलों में हो रहे अवैध खनन को बाद में खनन पट्टे देकर वैध बनाने की कोशिश की गई, जबकि उन्हें जिम्मेदार लोगों के खिलाफ उचित कार्रवाई करनी चाहिए थी। हम ऐसी गतिविधियों की अनुमति देने या उनमें मदद करने के लिए जिम्मेदार पाए जाने वाले अधिकारियों के खिलाफ उचित कार्रवाई का निर्देश देने पर विचार करेंगे।"
अदालत ने आगे कहा कि बिना जांच-पड़ताल के राज्य सरकार के स्पष्टीकरण को स्वीकार कर लेने से अवैध खनन को केवल "बाद में नियमित (Regularize) करने और मंजूरी देने" जैसी स्थिति में बदला जा सकता है, जबकि असल में वे गतिविधियां अवैध ही थीं।
अदालत ने जोर देकर कहा कि खनन पट्टा देने की प्रक्रिया का पालन करना और वास्तविक खनन कार्यों के दौरान पर्यावरणीय सुरक्षा मानकों का पालन करना—ये दोनों अलग-अलग आवश्यकताएं हैं।
अदालत ने कहा कि जिन क्षेत्रों में बाद में खनन पट्टे दिए गए , वहां पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का स्वतंत्र रूप से आकलन किया जाना चाहिए। इसमें नदी के प्राकृतिक प्रवाह, नदी तल और किनारों की अखंडता, प्राकृतिक रूप से संसाधनों के फिर से भरने की क्षमता (Replenishment Capacity), भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) और आसपास के इलाकों में कुल मिलाकर हो रहे खनन जैसे पहलुओं पर विचार किया जाना चाहिए।
अदालत ने कहा,
"राज्य सरकार केवल पकड़े गए मामलों की संख्या, दर्ज की गई FIR, वसूले गए जुर्माने या दिए गए खनन पट्टों की जानकारी देकर नदी प्रणालियों की रक्षा करने की अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकती। मुख्य बात यह है कि क्या अपनाए गए उपाय आगे होने वाले नुकसान को रोकने और प्रभावित क्षेत्रों को बहाल करने में सक्षम हैं?"
अवैध खनन के खिलाफ गुमनाम शिकायतों की व्यवस्था
अदालत ने निर्देश दिया कि 'एकीकृत सार्वजनिक रिपोर्टिंग और पर्यावरणीय शिकायत निवारण तंत्र' (Integrated Public Reporting and Environmental Grievance Redressal Mechanism)—जिसे पहले 7 अगस्त, 2026 तक स्थापित करने का आदेश दिया गया था—उसमें अवैध बजरी खनन और नदी पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करने वाली अन्य गैर-कानूनी गतिविधियों के बारे में गुमनाम शिकायतें दर्ज करने की सुविधा भी शामिल होनी चाहिए।
इस तंत्र में शिकायतों को दर्ज करने, उनकी जांच करने और उचित कार्रवाई के लिए उन्हें संबंधित सक्षम अधिकारियों के पास भेजने की व्यवस्था होनी चाहिए।
Case Title : In Re: 2 Million Lives At Risk, Contamination In Jojari River, Rajasthan