मिलावटी और असुरक्षित खाद्य पदार्थों पर सख्त कार्रवाई की मांग, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और FSSAI को जारी किया नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में मिलावटी और असुरक्षित खाद्य पदार्थों की बिक्री पर चिंता जताने वाली याचिका पर केंद्र सरकार और भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) को नोटिस जारी किया।
याचिका में खाद्य सुरक्षा कानून के तहत दंड और निगरानी व्यवस्था को और सख्त बनाने की मांग की गई।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने यह नोटिस आईवीएफ विशेषज्ञ डॉ. अनिरुद्ध मालपानी की याचिका पर जारी किया।
याचिका में कहा गया कि खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 का ढांचा अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है, लेकिन इसकी प्रभावी क्रियान्वयन व्यवस्था कमजोर है। बड़े खाद्य कारोबारियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुकाबले मौजूदा जुर्माने बेहद कम हैं, जिससे कानून का डर खत्म हो गया।
याचिका में कहा गया,
“मौजूदा दंड व्यवस्था इतनी कमजोर है कि बड़े कारोबारी इसे कारोबार की सामान्य लागत की तरह देखते हैं। भारी मुनाफे के सामने जुर्माने की रकम नगण्य साबित होती है।”
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि अधिनियम के अध्याय-9 में तय जुर्माने की अधिकतम सीमा आज की परिस्थितियों में प्रभावी नहीं रह गई।
उदाहरण के तौर पर, घटिया खाद्य पदार्थ बेचने पर अधिकतम 5 लाख रुपये और गलत ब्रांडिंग पर अधिकतम 3 लाख रुपये के जुर्माने का प्रावधान है, जो बड़ी कंपनियों के लिए कोई बड़ा दंड नहीं माना जा सकता।
याचिका में यह भी कहा गया कि खाद्य सुरक्षा कानून के पालन में गंभीर खामियां हैं। मामलों के निस्तारण में देरी, जुर्मानों की वसूली न होना और लंबित मामलों की बड़ी संख्या व्यवस्था की कमजोरी को दर्शाती है।
महालेखा परीक्षक (CAG) की 2017 की ऑडिट रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया कि लगाए गए करीब 47 प्रतिशत जुर्माने वसूल ही नहीं किए जा सके। साथ ही कई मामलों में तय समयसीमा के भीतर कार्रवाई भी पूरी नहीं हुई।
याचिका में कहा गया कि सुरक्षित और शुद्ध भोजन तक पहुंच नागरिकों के जीवन के अधिकार का हिस्सा है, जिसकी गारंटी संविधान के अनुच्छेद 21 में दी गई।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया कि जहरीले और असुरक्षित खाद्य पदार्थ सीधे लोगों के स्वास्थ्य और जीवन के लिए खतरा हैं।
याचिका में FSSAI की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए गए। इसमें कहा गया कि देश में खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की भारी कमी है, प्रयोगशालाएं पर्याप्त नहीं हैं और निगरानी तंत्र कमजोर है।
राज्यसभा में 13 मार्च 2026 को पेश आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा गया कि देशभर में खाद्य सुरक्षा अधिकारियों के 4,208 स्वीकृत पदों के मुकाबले केवल 2,997 अधिकारी ही कार्यरत हैं।
याचिका में यह भी कहा गया कि कई खाद्य परीक्षण प्रयोगशालाओं में कीटनाशक, भारी धातुओं और सूक्ष्म जैविक संक्रमण की जांच की पर्याप्त सुविधा तक मौजूद नहीं है। बड़ी संख्या में खाद्य नमूनों की अनिवार्य जांच भी नहीं की गई।
याचिका में मिलावटी डेयरी उत्पाद, दूषित मिड-डे मील और असुरक्षित पैकेज्ड खाद्य पदार्थों से जुड़े कई मामलों का जिक्र करते हुए कहा गया कि खाद्य सुरक्षा उल्लंघन संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों में व्यापक रूप से फैल चुके हैं।
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की कि खाद्य सुरक्षा कानून के तहत कंपनियों के कारोबार के अनुपात में जुर्माना तय किया जाए, निगरानी व्यवस्था मजबूत की जाए, प्रयोगशालाओं का विस्तार किया जाए कर्मचारियों की संख्या बढ़ाई जाए और उल्लंघन करने वाली कंपनियों की जानकारी सार्वजनिक की जाए।