राज्य कर्मचारियों को साल में दो बार महंगाई भत्ता कोई स्वतः अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि राज्य सरकार के कर्मचारी साल में दो बार महंगाई भत्ता (DA) पाने का अधिकार तभी जता सकते हैं, जब संबंधित सेवा नियमों में इसका स्पष्ट प्रावधान हो। केवल परंपरा या पहले दी गई सुविधा के आधार पर इसे अधिकार नहीं माना जा सकता।
यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार की उस अपील पर फैसला सुनाते हुए की जिसमें पश्चिम बंगाल सेवा (वेतन और भत्तों का संशोधन) नियम 2009 के तहत डीए भुगतान को लेकर दिए गए आदेशों को चुनौती दी गई।
मामले की सुनवाई जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने की।
पीठ ने कहा कि रोपा नियम, 2009 में कहीं भी यह नहीं लिखा कि महंगाई भत्ता साल में दो बार दिया ही जाएगा।
अदालत के अनुसार जो बात नियमों में साफ तौर पर दर्ज नहीं है उसे कर्मचारियों का कानूनी अधिकार नहीं माना जा सकता। कर्मचारियों की ओर से वैध अपेक्षा के सिद्धांत का हवाला देते हुए यह कहा गया कि पहले डीए साल में दो बार दिया जाता रहा है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वैध अपेक्षा का आधार तब ही बनता है जब उसका समर्थन कानून या नियमों के पाठ से मिलता हो।
यह विवाद तब शुरू हुआ, जब ट्रिब्यूनल ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह रोपा नियम, 2009 के तहत डीए भुगतान के लिए मानक तय करे और यह भी कहा कि डीए कम से कम साल में दो बार दिया जा सकता है।
राज्य सरकार की चुनौती पर कलकत्ता हाइकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के इस निर्देश को बरकरार रखते हुए कहा कि जब राज्य पहले साल में दो बार डीए देता रहा है तो अचानक उससे हटना उचित नहीं है।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट के सामने राज्य सरकार ने दलील दी कि रोपा नियमों में डीए भुगतान की कोई निश्चित अवधि तय नहीं की गई। ऐसे में न तो ट्रिब्यूनल और न ही हाइकोर्ट यह तय कर सकते हैं कि डीए साल में दो बार ही दिया जाए।
राज्य का कहना था कि डीए जारी करने की आवृत्ति पूरी तरह प्रशासनिक और वित्तीय निर्णय है, जिसे अदालतें निर्धारित नहीं कर सकतीं।
वहीं कर्मचारियों की ओर से यह कहा गया कि महंगाई भत्ता कोई अतिरिक्त लाभ नहीं बल्कि बढ़ती महंगाई से कर्मचारियों को न्यूनतम सुरक्षा देने का साधन है।
उनका तर्क था कि रोपा लागू होने के बाद शुरुआत में डीए साल में दो बार समायोजित किया गया लेकिन बाद में बिना किसी ठोस कारण के इसे रोक दिया गया।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि नई दिल्ली और चेन्नई में तैनात कर्मचारियों को अब भी साल में दो बार डीए मिलता है, जिससे भेदभाव होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की दलीलों को स्वीकार करते हुए कहा कि रोपा नियमों में डीए भुगतान की कोई निश्चित संख्या तय न होना महत्वपूर्ण है।
अदालत ने माना कि यह चूक जानबूझकर की गई ताकि डीए जारी करने का फैसला सरकार की वित्तीय क्षमता और विवेक पर छोड़ा जा सके।
कोर्ट ने यह भी कहा कि डीए का भुगतान राज्य की वित्तीय व्यवस्था से सीधे जुड़ा विषय है, जिसमें बजट योजना, संसाधनों का आवंटन और आर्थिक क्षमता का आकलन शामिल होता है। ऐसे मामलों में अदालत का हस्तक्षेप राज्य की वित्तीय स्वायत्तता में दखल माना जाएगा।
इन कारणों से सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिब्यूनल और हाइकोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें राज्य सरकार को महंगाई भत्ता कम से कम साल में दो बार देने का निर्देश दिया गया।