निर्माण में देरी के लिए भू-स्वामी जिम्मेदार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-02-23 10:10 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि भू-स्वामी ने डेवलपर को फ्लैट निर्माण, अनुमतियां प्राप्त करने और बिक्री का अधिकार दिया, उन्हें निर्माण में हुई देरी के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ ने एक गृह-खरीदार की अपील खारिज करते हुए राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के उस निर्णय को बरकरार रखा, जिसमें निर्माण में देरी के लिए भू-स्वामियों को दोषमुक्त किया गया।

मामला फरवरी, 2012 में भू-स्वामियों और यूनिशायर होम्स के बीच हुए संयुक्त विकास समझौते से जुड़ा था।

इस समझौते के तहत परियोजना के लिए आवश्यक अनुमतियां लेना, निर्माण करना और फ्लैट बेचना डेवलपर की जिम्मेदारी थी। इसके लिए भू-स्वामियों ने डेवलपर के पक्ष में सामान्य पावर ऑफ अटॉर्नी भी जारी की थी।

परियोजना में छह वर्ष से अधिक की देरी होने पर गृह-खरीदारों ने राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया और कब्जा व मुआवजे की मांग की।

आयोग ने डेवलपर को देरी के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए खरीदारों को ब्याज देने का निर्देश दिया लेकिन भू-स्वामियों को यह कहते हुए राहत दी कि निर्माण कार्य उनकी जिम्मेदारी नहीं था।

गृह-खरीदारों ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 67 के तहत सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

उनका तर्क था कि चूंकि भू-स्वामियों ने डेवलपर को पावर ऑफ अटॉर्नी दी थी, इसलिए वे एजेंट के कृत्यों के लिए परोक्ष रूप से जिम्मेदार हैं।

जस्टिस आलोक आराधे द्वारा लिखित निर्णय में पीठ ने इस तर्क को अस्वीकार कर दिया।

अदालत ने कहा,

“डेवलपर की चूक के लिए वे भू-स्वामी, जिनका निर्माण कार्य से कोई सरोकार नहीं है, सेवा में कमी के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराए जा सकते विशेषकर तब जब डेवलपर ने निर्माण से संबंधित अपने कृत्यों या त्रुटियों के लिए उन्हें प्रतिपूर्ति का आश्वासन दिया हो।”

अदालत ने यह भी कहा,

“निर्माण कार्य डेवलपर द्वारा किया जाना था। कब्जा देने में देरी उन फ्लैटों के संबंध में है, जो डेवलपर के हिस्से में आते हैं।”

इन टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने गृह-खरीदारों की अपील खारिज की।

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