आपराधिक मामले में प्रोबेशन पर रिहाई से विभागीय सजा कम नहीं की जा सकती: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-01-22 11:22 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी कर्मचारी को आपराधिक मामले में प्रोबेशन (परिवीक्षा) का लाभ मिल जाना, विभागीय कार्यवाही में दी गई सजा को कम करने का आधार नहीं हो सकता। कोर्ट ने कहा कि प्रोबेशन पर रिहाई से दोषसिद्धि (कन्विक्शन) का दाग समाप्त नहीं होता।

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले को गलत ठहराया, जिसमें केवल इस आधार पर कर्मचारी की सजा कम कर दी गई कि उसे आपराधिक मामले में प्रोबेशन का लाभ दिया गया।

पीठ ने कहा,

“हाईकोर्ट यह मानकर गलती कर बैठा कि कर्मचारी की दोषसिद्धि कोई अयोग्यता नहीं है। केवल इसी आधार पर उसे सेवा से हटाया नहीं जा सकता।”

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला एक ऐसे कर्मचारी से जुड़ा था, जिसने अपने भाई का रूप धारण कर और जाली शैक्षणिक प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी हासिल की थी। विभागीय जांच के बाद उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। बाद में लेबर कोर्ट ने बर्खास्तगी की सजा को बदलते हुए वेतन में कटौती और तीन वर्षों तक वेतन वृद्धि रोकने का आदेश दिया।

इसके बाद मद्रास हाईकोर्ट ने यह कहते हुए सजा को अनिवार्य सेवानिवृत्ति (कंपल्सरी रिटायरमेंट) में बदल दिया कि कर्मचारी को आपराधिक मामले में प्रोबेशन का लाभ दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट का रुख

हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए अधीक्षण अभियंता (सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर) सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। अपील में यूनियन ऑफ इंडिया बनाम बख्शी राम (1990) के फैसले का हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया कि प्रोबेशन पर रिहाई से दोषसिद्धि का कलंक खत्म नहीं होता।

सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील से सहमति जताते हुए कहा कि जब तक दोषसिद्धि कायम है, तब तक केवल प्रोबेशन का लाभ मिलने के आधार पर बर्खास्तगी जैसी सजा को कम नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट की यह टिप्पणी कानून के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत है और बख्शी राम मामले में तय कानून के अनुरूप नहीं है।

हालांकि यह ध्यान में रखते हुए कि संबंधित कर्मचारी की मृत्यु हो चुकी है, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा सजा में किए गए संशोधन में हस्तक्षेप नहीं किया।

इसी के साथ अपील का निपटारा कर दिया गया।

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