डाइंग डिक्लेरेशन पर सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: डॉक्टर की राय पुलिस से अधिक विश्वसनीय
सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि किसी व्यक्ति की मृत्यु पूर्व दिए गए बयान (डाइंग डिक्लेरेशन) की विश्वसनीयता तय करते समय डॉक्टर की राय को प्राथमिकता दी जाएगी, न कि पुलिस अधिकारी के आकलन को।
अदालत ने इसी आधार पर एक पति की हत्या के मामले में सजा को बरकरार रखा।
जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस एस. वी. एन. भट्टी की खंडपीठ ने कर्नाटक हाइकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए आरोपी पति की अपील खारिज कर दी।
आरोपी को अपनी पत्नी की हत्या (धारा 302) और क्रूरता (धारा 498ए) के अपराध में दोषी ठहराया गया।
मामले के अनुसार पति-पत्नी के बीच विवाद के दौरान आरोपी ने पत्नी पर केरोसिन डालकर उसे आग लगा दी। गंभीर रूप से घायल महिला को अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टर ने उसे बयान देने के लिए मानसिक रूप से सक्षम बताया। इसके बाद पुलिस ने उसका डाइंग डिक्लेरेशन दर्ज किया।
बचाव पक्ष ने इस बयान की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए कहा कि जांच अधिकारी ने अपने बयान में कहा कि महिला उस समय बेहोश थी और बोलने की स्थिति में नहीं थी, इसलिए यह बयान भरोसेमंद नहीं है।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने उक्त दलील खारिज करते हुए कहा कि डॉक्टर द्वारा प्रमाणित किए जाने के बाद कि पीड़िता बयान देने की स्थिति में थी, पुलिस अधिकारी का विपरीत बयान उस पर भारी नहीं पड़ सकता।
अदालत ने कहा,
“डॉक्टर, जो इलाज कर रहा था और जिसने यह सुनिश्चित किया कि पीड़िता बयान देने के लिए सक्षम है, उसकी राय को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जांच अधिकारी का बयान इस तथ्य को कमजोर नहीं कर सकता।”
अदालत ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट ने मामूली विरोधाभासों के आधार पर आरोपी को बरी कर दिया था, जो सही नहीं था। हाइकोर्ट ने सही तरीके से साक्ष्यों का मूल्यांकन करते हुए दोषसिद्धि की थी।
इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपी के खिलाफ आरोप सिद्ध होते हैं और उसे दी गई सजा उचित है।
इसी के साथ अपील को खारिज कर दिया गया।