मोटर दुर्घटना मुआवजा: ग्रुप बीमा की राशि नहीं होगी कम, सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया सिद्धांत

Update: 2026-03-17 07:08 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि नियोक्ता द्वारा दी गई समूह बीमा योजना या अन्य सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से मिलने वाली राशि को मोटर वाहन दुर्घटना मुआवजे से घटाया नहीं जा सकता।

जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ ने केरल और कर्नाटक हाइकोर्ट के फैसलों को बरकरार रखते हुए इस संबंध में दायर अपीलों को खारिज किया।

अदालत ने कहा कि इस तरह की बीमा या सामाजिक सुरक्षा से मिलने वाली राशि आर्थिक लाभ (पेक्यूनियरी एडवांटेज) नहीं मानी जा सकती, जिसे मुआवजे से घटाया जाए।

खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि नियोक्ता द्वारा दी गई बीमा सुविधा एक अलग अनुबंध के तहत मिलती है और इसका मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत मिलने वाले मुआवजे से कोई सीधा संबंध नहीं है। इसलिए इसे दोहरा लाभ मानकर कम नहीं किया जा सकता।

अदालत ने अपने फैसले में पूर्व के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि केवल वही लाभ मुआवजे से घटाया जा सकता है, जिसका सीधा संबंध दुर्घटना से हो।

खंडपीठ ने कहा,

“मृतक के आश्रितों को समूह बीमा या अन्य सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से मिलने वाली राशि स्वतंत्र अनुबंध से उत्पन्न होती है। इसका मोटर दुर्घटना में मृत्यु से सीधा संबंध नहीं है, इसलिए इसे मुआवजे से घटाया नहीं जा सकता।”

मामले में मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) ने पहले बीमा राशि को मुआवजे से घटा दिया था, जिसे हाइकोर्ट ने रद्द कर दिया। इसी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई।

सुप्रीम कोर्ट ने हाइकोर्ट का फैसला सही ठहराते हुए कहा कि मुआवजा न्यायसंगत क्षतिपूर्ति के सिद्धांत पर आधारित है और तकनीकी आधारों पर इसे कम नहीं किया जा सकता।

अदालत ने यह भी कहा कि मोटर दुर्घटना से जुड़े मामले सामाजिक न्याय के उद्देश्य से संचालित होते हैं, इसलिए इन्हें तकनीकी आपत्तियों के आधार पर कमजोर नहीं किया जाना चाहिए।

अंततः सुप्रीम कोर्ट ने सभी अपीलें खारिज करते हुए निर्देश दिया कि निर्धारित मुआवजा छह सप्ताह के भीतर अदा किया जाए।

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