क्या दोषी को सरेंडर किए बिना अपील/रिवीजन सुनी जा सकती है? सुप्रीम कोर्ट ने मामला बड़ी बेंच को भेजा
सुप्रीम कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न बड़ी बेंच को भेजा कि क्या हाईकोर्ट किसी दोषी को जेल में आत्मसमर्पण किए बिना उसकी आपराधिक अपील या पुनरीक्षण याचिका सुन सकता है?
जस्टिस पामिडिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ ने कहा कि इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की विभिन्न पीठों के फैसलों में मतभेद है, इसलिए स्पष्टता के लिए बड़ी पीठ का निर्णय आवश्यक है।
यह मामला उस याचिका से जुड़ा है, जिसमें एक दोषी ने राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। राजस्थान हाईकोर्ट ने उसकी पुनर्विचार याचिका और सजा स्थगन आवेदन यह कहते हुए सुनने से इनकार किया था कि उसने पहले आत्मसमर्पण नहीं किया।
राजस्थान हाईकोर्ट नियम 1952 के नियम 311(3) के अनुसार यदि किसी व्यक्ति को कारावास की सजा हुई है और वह जमानत पर नहीं है तो अपील या पुनरीक्षण के साथ यह प्रमाणपत्र देना आवश्यक है कि उसने आत्मसमर्पण कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक पूर्व निर्णय में यह माना गया कि असाधारण परिस्थितियों में हाइकोर्ट अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग कर आत्मसमर्पण से छूट दे सकता है। हालांकि बाद के अन्य फैसले में इस दृष्टिकोण पर संदेह जताया गया और कहा गया कि जब कानून में ऐसी छूट का स्पष्ट प्रावधान नहीं है, तब केवल अंतर्निहित शक्तियों के आधार पर राहत देना उचित नहीं होगा।
खंडपीठ ने कहा कि इन विरोधाभासी दृष्टिकोणों के कारण कानून की स्थिति अस्पष्ट हो गई और कई हाइकोर्ट भी इसी दुविधा का सामना कर रहे हैं।
अदालत ने कहा,
“नियम 311(3) के तहत आत्मसमर्पण की बाध्यता तथा दंड प्रक्रिया संहिता की अंतर्निहित शक्तियों के बीच संबंध को लेकर उत्पन्न अनिश्चितता का शीघ्र समाधान आवश्यक है।”
अब यह मामला चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) के समक्ष रखा जाएगा ताकि इस प्रश्न पर विचार के लिए बड़ी बेंच गठित की जा सके।