जमानत सुनवाई टालना सही नहीं: राशि जमा न करने के आधार पर देरी नहीं हो सकती- सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल इस आधार पर जमानत याचिका की सुनवाई को टाला नहीं जा सकता कि आरोपी ने अदालत के समक्ष दी गई राशि जमा करने की अंडरटेकिंग का पालन नहीं किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत याचिका का फैसला उसके गुण-दोष के आधार पर किया जाना चाहिए।
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने दिल्ली हाइकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया, जिसमें एक कंपनी के निदेशक की जमानत याचिका केवल इस कारण लंबित रखी गई कि उसने शेष राशि जमा करने का वचन पूरा नहीं किया, जबकि कथित रूप से गबन की गई राशि का एक बड़ा हिस्सा पहले ही अदालत में जमा किया जा चुका था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा,
“हमारे विचार में अदालत को जमानत याचिका को उसके अपने गुण-दोष के आधार पर तय करना चाहिए, न कि अंतरिम जमानत बढ़ाते हुए अग्रिम जमा पर जोर देकर मामले को लंबित रखना चाहिए।”
मामला
यह मामला एम/एस प्रगत अक्षय ऊर्जा लिमिटेड को दी गई लगभग 4.10 करोड़ रुपये की सरकारी सब्सिडी के कथित दुरुपयोग से जुड़ा है। अपीलकर्ता कंपनी का एक निदेशक है, जिसे 12 दिसंबर 2019 को गिरफ्तार किया गया। कंपनी ने 26 दिसंबर 2019 को 2 करोड़ 17 लाख 92 हजार 500 रुपये अदालत में जमा कर दिए।
इसके बाद अपीलकर्ता के वकील ने यह बयान दिया कि शेष राशि भी जमा कर दी जाएगी, जिसके आधार पर दिल्ली हाइकोर्ट ने 22 अप्रैल, 2020 को उसे अंतरिम जमानत दी थी। हालांकि नियमित जमानत याचिका लंबित रही और अंतरिम जमानत समय-समय पर बढ़ाई जाती रही।
बाद में, शेष राशि जमा न होने के आधार पर हाइकोर्ट ने अंतरिम जमानत रद्द की, जिसके बाद अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि भले ही अंडरटेकिंग का पालन नहीं हुआ हो, लेकिन हाइकोर्ट को उसकी जमानत याचिका का फैसला गुण-दोष के आधार पर करना चाहिए, न कि केवल उसी आधार पर अंतरिम जमानत रद्द करनी चाहिए। इसके समर्थन में गजानन दत्तात्रय गोरे बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले का हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया कि जमानत याचिकाओं को राशि जमा करने की शर्तों से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
वहीं राज्य सरकार ने कुंदन सिंह बनाम सीजीएसटी अधीक्षक मामले का हवाला देते हुए कहा कि जब आरोपी ने स्वयं किसी शर्त पर सहमति दी है, तो वह बाद में उस पर सवाल नहीं उठा सकता।
दोनों पक्षकारों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दोनों फैसले अलग-अलग परिस्थितियों में लागू होते हैं। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि जमानत सुनवाई को राशि जमा करने की पूर्व शर्त से जोड़ना हतोत्साहित किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे आपराधिक न्याय प्रणाली के दुरुपयोग की आशंका पैदा होती है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा,
“कंपनी के निदेशक के खिलाफ IPC की धारा 409 के तहत कोई स्वतः दोषसिद्धि की धारणा नहीं होती। निदेशक की आपराधिक जिम्मेदारी ट्रायल में सिद्ध की जानी होती है। ऐसे में, जब कथित रूप से गबन की गई सब्सिडी की 50 प्रतिशत से अधिक राशि पहले ही जमा हो चुकी है तो केवल शेष राशि जमा न होने के आधार पर जमानत पर विचार न करना उचित नहीं है।”
अंत में सुप्रीम कोर्ट ने अपील का निपटारा करते हुए दिल्ली हाइकोर्ट को निर्देश दिया कि वह अपीलकर्ता की नियमित जमानत याचिका का यथाशीघ्र, और अधिमानतः तीन सप्ताह के भीतर, कानून के अनुसार फैसला करे।