सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि कोई व्यक्ति जीवनभर दूसरों पर निर्भर रहने और अटेंडेंट की सहायता लेने के लिए मजबूर है, तो उसे 100% कार्यात्मक दिव्यांगता से पीड़ित माना जा सकता है, भले ही मेडिकल बोर्ड ने उसकी शारीरिक दिव्यांगता का प्रतिशत इससे कम आंका हो।

जस्टिस एसवीएन भट्टी और जस्टिस एनवी अंजारिया की खंडपीठ ने मोटर दुर्घटना के एक मामले में यह टिप्पणी करते हुए पीड़ित सुनील कुमार का मुआवजा ₹36.22 लाख से बढ़ाकर ₹77.84 लाख कर दिया।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला 22 अक्टूबर 2016 को केरल में त्रिशूर-कोडकारा सार्वजनिक मार्ग पर पलियेक्करा टोल प्लाजा के पास हुई सड़क दुर्घटना से जुड़ा है। सुनील कुमार दुर्घटना के समय मोटरसाइकिल पर पीछे बैठे थे। हादसे में उन्हें सिर में गंभीर चोटें आईं, जिनमें डिफ्यूज एक्सोनल इंजरी और मिडब्रेन कंट्यूजन शामिल थीं।

मेडिकल बोर्ड ने उनकी स्थायी मेडिकल दिव्यांगता 75.5% आंकी थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि चोटों का उनके जीवन और कमाने की क्षमता पर गंभीर प्रभाव पड़ा है तथा उन्हें जीवनभर अटेंडेंट और देखभाल करने वाले व्यक्ति की जरूरत होगी।

मेडिकल और कार्यात्मक दिव्यांगता में क्या अंतर है?

अदालत ने स्पष्ट किया कि मुआवजा तय करते समय केवल मेडिकल बोर्ड द्वारा बताए गए दिव्यांगता प्रतिशत को नहीं देखा जा सकता। यह भी देखना जरूरी है कि चोटों ने व्यक्ति की रोजमर्रा की जिंदगी, स्वतंत्र रूप से काम करने और कमाई करने की क्षमता को कितना प्रभावित किया है।

कोर्ट ने कहा कि मेडिकल बोर्ड ने दिव्यांगता 75.5% आंकी, लेकिन उसके कार्यात्मक प्रभाव को 100% माना जा सकता है।

कितना मुआवजा दिया गया?

सुप्रीम कोर्ट ने सुनील कुमार की कार्यात्मक दिव्यांगता 100% निर्धारित करते हुए स्थायी दिव्यांगता और कमाई की क्षमता के नुकसान के लिए ₹31.50 लाख तथा जीवनभर अटेंडेंट की जरूरत को देखते हुए ₹25.20 लाख का मुआवजा तय किया।

इस तरह उनका कुल मुआवजा ₹77,84,394 कर दिया गया। अतिरिक्त मुआवजे पर दावा याचिका दाखिल करने की तारीख से वास्तविक भुगतान तक 6.5% सालाना ब्याज भी दिया जाएगा।

इसी मामले से जुड़ी दूसरी अपील में अदालत ने श्रीजीत के.एस. की कार्यात्मक दिव्यांगता मेडिकल बोर्ड के 62% आकलन के मुकाबले 80% निर्धारित की और उनका कुल मुआवजा बढ़ाकर ₹69,60,880 कर दिया।

बीमा कंपनी को दोनों पीड़ितों को देय अतिरिक्त मुआवजा ब्याज सहित छह सप्ताह के भीतर संबंधित मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) में जमा करने का निर्देश दिया गया।

फैसले का महत्व: यह निर्णय स्पष्ट करता है कि मोटर दुर्घटना मुआवजे में दिव्यांगता का आकलन केवल मेडिकल प्रतिशत के आधार पर नहीं, बल्कि चोटों के वास्तविक कार्यात्मक प्रभाव और व्यक्ति की कमाई की क्षमता पर पड़े असर को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

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