शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा राज्यों को निर्देश दिया कि वे 20 वर्षों की अवधि में हिमाचल प्रदेश को लगभग 11,973 मिलियन यूनिट (MU) बिजली उपलब्ध कराएं। इसके साथ ही, भाखड़ा-नांगल और ब्यास जलविद्युत परियोजनाओं से उत्पन्न बिजली के बंटवारे को लेकर दशकों से चला आ रहा विवाद समाप्त हो गया।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने दोनों राज्यों को निर्देश दिया कि वे 'लीन सीजन' (अक्टूबर से मार्च) के दौरान हर साल लगभग 598 मिलियन यूनिट बिजली देकर यह बकाया चुकाएं।

कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि इन परियोजनाओं की पूंजीगत लागत (Capital Cost) में हिमाचल प्रदेश के 7.19% हिस्से (जो ₹420.77 करोड़ आंका गया) को बिजली के बकाये के साथ समायोजित (Adjust) किया जाए। इसके लिए बिजली की कीमत ₹3.85 प्रति यूनिट तय की गई है, जिससे लगभग 1,093 मिलियन यूनिट का समायोजन होगा।

ये निर्देश हिमाचल प्रदेश द्वारा 1996 में संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत दायर मुकदमे के संदर्भ में दिए गए, जिसमें राज्य ने इन दो जलविद्युत परियोजनाओं से उत्पन्न बिजली में अपना उचित हिस्सा मांगा था।

2011 के अपने फैसले में कोर्ट ने कहा कि हिमाचल प्रदेश, तत्कालीन संयुक्त पंजाब राज्य के हिस्से की बिजली में से 7.19% पाने का हकदार है। हालांकि, इस फैसले को लागू करने के दौरान बकाये की मात्रा, लागू टैरिफ और राज्यों की पूंजीगत लागत देनदारियों को लेकर और विवाद खड़े हो गए।

भारत सरकार (यूनियन ऑफ इंडिया) ने 1 नवंबर 1966 से अक्टूबर 2011 तक की अवधि के लिए हिमाचल प्रदेश के कुल बिजली बकाये का हिसाब 13,066 मिलियन यूनिट लगाया। सरकार ने प्रस्ताव दिया कि यह बकाया 15 वर्षों में बिजली के रूप में दिया जाए, और पूंजीगत लागत की देनदारी को बिजली के हिस्से के साथ समायोजित कर लिया जाए।

पंजाब ने इस गणना पर सवाल उठाते हुए तर्क दिया कि हिमाचल प्रदेश को दी गई अतिरिक्त बिजली को ध्यान में रखते हुए बकाया राशि कम की जानी चाहिए, और पूंजी-लागत (कैपिटल-कॉस्ट) की देनदारी की गणना अलग तरीके से होनी चाहिए। हरियाणा ने भी अपनी देनदारी की रकम को लेकर आपत्तियां जताईं।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब की आपत्तियों को खारिज किया। कोर्ट ने कहा कि ये आपत्तियां "अस्पष्ट और सतही" थीं। इनका मकसद उन मुद्दों पर फिर से मुकदमा चलाना था, जिन्हें कोर्ट ने अपने 2011 के फैसले (डिक्री) के जरिए पहले ही सुलझा दिया था।

कोर्ट ने गौर किया कि केंद्र सरकार द्वारा समझौता कराने की लगातार कोशिशों के बावजूद, यह विवाद कई दशकों से अनसुलझा पड़ा था।

कोर्ट ने टिप्पणी की,

"यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि जो विवाद कई दशकों से लंबित है, वह अभी भी खिंचता जा रहा है, जिस पर कोर्ट का और अधिक समय और ध्यान लगाने की जरूरत पड़ रही है।"

केंद्र सरकार ने बकाया राशि के भुगतान के लिए 15 साल की अवधि का प्रस्ताव दिया था, लेकिन कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा पर बोझ कम करने और इस लंबे समय से चले आ रहे विवाद को खत्म करने के लिए इस अवधि को बढ़ाकर 20 साल कर दिया।

कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि हिमाचल प्रदेश को भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड द्वारा तय किए गए शुल्क का भुगतान करना होगा। यह शुल्क उस वर्ष के लिए होगा, जिस वर्ष बिजली की कोई खेप (Tranche) प्राप्त होती है।

अपने निर्देशों के अनिवार्य (बाध्यकारी) होने पर जोर देते हुए कोर्ट ने कहा:

"इस कोर्ट द्वारा जारी किए गए निर्देश बाध्यकारी हैं और इनका बिना किसी हिचकिचाहट के पालन किया जाना चाहिए। कई दशकों से लंबित पड़े इस फैसले (डिक्री) को, किसी देनदार (Judgment Debtor) की अनिच्छा या अड़ियल रवैये के कारण बेकार नहीं जाने दिया जा सकता।"

इसके साथ ही यह मामला निस्तारित (समाप्त) किया गया।

Case Title : State of Himachal Pradesh v. Union of India and others

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