सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए टीम में काम करने की क्षमता भी अहम: CJI सूर्यकांत बोले- बढ़ती फाइलिंग के बीच कोर्ट अब T20 मैच खेल रहा
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम जिन पहलुओं पर विचार करता है, उनमें यह भी शामिल है कि संबंधित जज एक टीम के सदस्य के रूप में कितनी प्रभावी ढंग से काम कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में मुकदमों की बढ़ती संख्या और लगातार दाखिल हो रही याचिकाओं के कारण अदालत अब लगभग T20 मैच खेल रही है।
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने बुधवार (4 नवंबर) को कहा,
“कम से कम मैं जिन पहलुओं को हमेशा ध्यान में रखता हूं, उनमें से एक यह है कि आप टीम के सदस्य के रूप में किस तरह काम करेंगे, क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में मामले दाखिल होने के कारण सुप्रीम कोर्ट अब लगभग T20 मैच खेल रहा है।”
वह सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) की ओर से नवनियुक्त जजों जस्टिस सुनीता अग्रवाल और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह के सम्मान में आयोजित समारोह को संबोधित कर रहे थे। दोनों जजों ने 6 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में शपथ ली थी।
सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति के लिए इन पहलुओं पर होता है विचार
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया पर बात करते हुए बताया कि कॉलेजियम वरिष्ठता, प्रदर्शन, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और विविधता जैसे पहलुओं पर विचार करता है।
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में मामलों की संख्या में भारी वृद्धि न्यायपालिका के प्रति जनता के बढ़ते विश्वास को दर्शाती है। हालांकि, इसके साथ ही लंबित मामलों की संख्या भी बढ़ रही है।
चीफ़ जस्टिस ने न्यायपालिका में बेंच और बार के बीच संबंधों के महत्व पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि बार केवल अदालत में दलीलें पेश करके ही कानून के विकास में योगदान नहीं देता, बल्कि स्वतंत्र दृष्टिकोण, गहन शोध और पेशेवर अनुभव के माध्यम से भी न्यायालय की सहायता करता है।
उन्होंने कहा कि बेंच को भी वकीलों के तर्कों, उनकी बातों और रचनात्मक आलोचना के प्रति खुला रहना चाहिए।
चीफ़ जस्टिस ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नति केवल पद में बदलाव नहीं है, बल्कि इससे न्यायिक जिम्मेदारी का दायरा और प्रभाव भी बढ़ जाता है।
जस्टिस सुनीता अग्रवाल की प्रशासनिक क्षमता की सराहना
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने जस्टिस सुनीता अग्रवाल की न्यायिक और प्रशासनिक क्षमताओं की सराहना की। उन्होंने विशेष रूप से गुजरात हाईकोर्ट में न्यायिक बुनियादी ढांचे के विकास के लिए उनके काम का उल्लेख किया और उन्हें एक न्यायाधीश के साथ-साथ “हार्डकोर एडमिनिस्ट्रेटर” बताया।
जस्टिस अपरेश कुमार सिंह के तेलंगाना हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के कार्यकाल को याद करते हुए CJI ने एक ऐसे पुराने मामले का जिक्र किया, जो 10-12 वर्षों से लंबित था और उनके कार्यकाल के दौरान उसका निपटारा हुआ।
यह सम्मान समारोह सुप्रीम कोर्ट के एडमिनिस्ट्रेटिव बिल्डिंग्स कॉम्प्लेक्स के मुख्य ऑडिटोरियम में आयोजित किया गया। इसमें जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले और जस्टिस अरुण पल्ली सहित कई न्यायाधीश मौजूद रहे।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता, SCBA अध्यक्ष और सीनियर एडवोकेट प्रदीप कुमार राय, उपाध्यक्ष राहुल कौशिक और सचिव प्रज्ञा बघेल सहित अन्य पदाधिकारी भी समारोह में शामिल हुए।
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अग्रवाल और जस्टिस सिंह के साथ पदोन्नत हुए जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय घरेलू कारणों से समारोह में शामिल नहीं हो सके। बाद में CJI ने स्पष्ट किया कि उन्हें अपने गृह नगर जाना पड़ा था।
जस्टिस अपरेश कुमार सिंह बोले- हर मुकदमे के पीछे एक मानवीय कहानी होती है
समारोह को संबोधित करते हुए जस्टिस अपरेश कुमार सिंह ने इसे अपने लिए घर वापसी जैसा अवसर बताया। उन्होंने याद किया कि करीब 42 साल पहले वह दिल्ली आए थे और दिल्ली विश्वविद्यालय से LLB की पढ़ाई की थी।
बार में अपने 22 वर्षों के अनुभव का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि कानूनी कार्यवाही के दौरान मामलों के पीछे छिपी मानवीय कहानियों को नहीं भूलना चाहिए।
उन्होंने कहा,
“तथ्यों, आंकड़ों और उद्धृत किए गए फैसलों के पीछे एक और भी महत्वपूर्ण चीज होती है- एक मानवीय कहानी। कोई मामला अदालत में सूचीबद्ध सैकड़ों मामलों में से एक हो सकता है, लेकिन उस व्यक्ति के लिए जो अदालत में खड़ा है, वही उसकी दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण मामला हो सकता है।”
उन्होंने कहा कि अंततः बार और बेंच दोनों की भूमिका एक ही है- न्याय की खोज।
जस्टिस सुनीता अग्रवाल ने युवा महिला वकीलों को दिया संदेश
जस्टिस सुनीता अग्रवाल ने अपने न्यायिक सफर को एक छोटे शहर की उस सामान्य लड़की की यात्रा बताया, जिसने बड़े सपने देखने का साहस किया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए उन्होंने बताया कि बार के कई सदस्य उनसे खुले तौर पर पूछते थे कि वह कानूनी पेशे में कैसे टिक पाएंगी।
उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट को अपना “हाई स्कूल” और गुजरात हाईकोर्ट को “ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन” बताते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट में पहुंचना उनके लिए पीएचडी कार्यक्रम में प्रवेश लेने जैसा है। उन्होंने कहा कि कानून की पढ़ाई और सीखने की प्रक्रिया लगातार जारी रहती है।
युवा महिला वकीलों को संबोधित करते हुए जस्टिस अग्रवाल ने कहा कि उन्हें अवसरों का इंतजार करने के बजाय खुद अवसर पैदा करने चाहिए।
उन्होंने कहा,
“अवसरों के आपके दरवाजे पर दस्तक देने का इंतजार मत कीजिए। उन्हें खुद बनाने के लिए तैयार रहिए और जब कोई अवसर मिले, तो उसे हाथ से जाने मत दीजिए।”
उन्होंने आगे कहा, “अगर मैं यह कर सकती हूं, तो आप भी कर सकती हैं।”
न्यायपालिका को बदनाम करने के प्रयासों पर संस्थागत प्रतिक्रिया जरूरी: SCBA अध्यक्ष
SCBA अध्यक्ष प्रदीप कुमार राय ने अपने संबोधन में बार के कल्याण के लिए CJI द्वारा उठाए गए कदमों की सराहना की। इनमें महिला वकीलों के बार रूम का विस्तार, कैंटीन का नवीनीकरण, चिकित्सा सुविधाएं और वकीलों को मध्यस्थता (Arbitration) का प्रशिक्षण देने की मंजूरी शामिल है।
राय ने न्यायपालिका को बदनाम करने के प्रयासों के खिलाफ संस्थागत स्तर पर प्रतिक्रिया देने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
उन्होंने कहा कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से अपने खिलाफ कथित रूप से अपमानजनक टिप्पणियां करने वाले लोगों के विरुद्ध मामले दायर किए थे, लेकिन आरोपियों द्वारा माफी मांगने या दंडित किए जाने के बाद आपराधिक कार्यवाही आगे नहीं बढ़ाई। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट एक संस्था है और उसकी गरिमा तथा स्वतंत्रता की रक्षा करना जरूरी है।
उन्होंने कहा,
“माफी का अपना महत्व हो सकता है, लेकिन संस्थागत जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटा जा सकता। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा की जानी चाहिए, लेकिन हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि हमारे संवैधानिक संस्थानों की गरिमा और स्वतंत्रता से किसी भी स्तर पर समझौता न हो।”
उन्होंने आगे कहा, “अगर हम धर्म की रक्षा करने के लिए तैयार नहीं हैं, तो हम यह उम्मीद नहीं कर सकते कि धर्म हमारी संस्था की रक्षा करेगा।”
समारोह के अंत में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार और अटॉर्नी जनरल की ओर से नवनियुक्त जजों को शुभकामनाएं दीं। इसके बाद SCBA पदाधिकारियों ने जस्टिस सुनीता अग्रवाल और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह को स्मृति चिह्न भेंट किए।