बचाव पक्ष की कमी पूरी करने के लिए नहीं इस्तेमाल हो सकती CrPC की धारा 311 की शक्ति : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने दुष्कर्म पीड़िता को दोबारा जिरह के लिए बुलाने की अनुमति देने वाले त्रिपुरा हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 311 का इस्तेमाल बचाव पक्ष की कमियां पूरी करने के लिए नहीं किया जा सकता।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की खंडपीठ ने त्रिपुरा सरकार की अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के 14 मार्च 2024 के आदेश को निरस्त किया। हाईकोर्ट ने कॉल डिटेल रिकॉर्ड के आधार पर पीड़िता से दोबारा जिरह की अनुमति दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पीड़िता पहले ही चार अलग-अलग मौकों पर बयान और जिरह की प्रक्रिया से गुजर चुकी है। ऐसे में चार साल बाद उसे फिर से अदालत बुलाना उसके लिए अनावश्यक और असहनीय मानसिक पीड़ा पैदा करेगा।
खंडपीठ ने कहा,
“गंभीर अपराधों की पीड़िताओं को बार-बार अदालत में पेश होकर जिरह का सामना करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। इससे पीड़ितों को अनावश्यक कठिनाई और मानसिक उत्पीड़न झेलना पड़ता है।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि CrPC की धारा 311 के तहत गवाह को दोबारा बुलाने की शक्ति का इस्तेमाल केवल असाधारण परिस्थितियों में और न्यायहित में ही किया जा सकता है।
अदालत ने कहा,
“इस प्रावधान का उपयोग बचाव पक्ष या अभियोजन की कमियां भरने के लिए नहीं किया जा सकता।”
मामला वर्ष 2016 में दर्ज FIR से जुड़ा है, जिसमें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 342, 376(1) और 506 के तहत आरोप लगाए गए।
सुनवाई के दौरान पीड़िता का बयान और जिरह वर्ष 2018 में हुई। बाद में हाईकोर्ट के एक पुराने आदेश के आधार पर वर्ष 2019 में उसे फिर बुलाकर दोबारा जिरह की गई।
इसके करीब चार साल बाद दिसंबर 2023 में आरोपी ने धारा 311 के तहत आवेदन दायर कर पीड़िता को फिर से बुलाने की मांग की। आरोपी ने 94 सवाल पूछने की अनुमति मांगी और कहा कि कॉल डिटेल रिकॉर्ड से जुड़े कुछ पहलुओं पर पहले सवाल नहीं किए जा सके।
ट्रायल कोर्ट ने इस आवेदन को खारिज करते हुए कहा था कि पीड़िता पहले ही विस्तृत जिरह का सामना कर चुकी है और यह आवेदन मुकदमे को लंबा खींचने का प्रयास प्रतीत होता है। हालांकि, हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश पलटते हुए दोबारा जिरह की अनुमति दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को गलत ठहराते हुए कहा कि कॉल डिटेल रिकॉर्ड आरोपपत्र के साथ पहले से ही रिकॉर्ड पर मौजूद थे। बचाव पक्ष को इन दस्तावेजों की पूरी जानकारी थी और वह पहले की जिरह के दौरान इन पर सवाल पूछ सकता था।
अदालत ने ट्रायल कोर्ट का 6 फरवरी 2024 का आदेश बहाल करते हुए मुकदमे की सुनवाई इस वर्ष के अंत तक पूरी करने का निर्देश दिया।