सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 'नेशनल बुक ट्रस्ट' (NBT) संविधान के अनुच्छेद 12 के अर्थ में 'प्राधिकरण' (Authority) है, इसलिए मौलिक अधिकारों को लागू करने के उद्देश्य से इसे 'राज्य' (State) माना जाएगा।
कोर्ट ने पाया कि सरकार का इस ट्रस्ट पर गहरा और व्यापक नियंत्रण है। इसमें ट्रस्ट का गठन, संचालन करने वाली संस्था की संरचना, कामकाज और वित्तीय प्रबंधन शामिल हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक सोसाइटी के रूप में ट्रस्ट का पंजीकरण होना या उसका अपनी आय खुद अर्जित करना, उसे अनुच्छेद 12 के दायरे से बाहर नहीं करता है।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने नेशनल बुक ट्रस्ट की अपील खारिज करते हुए कहा,
"यह ट्रस्ट वित्तीय, कार्यात्मक और प्रशासनिक रूप से सरकार के नियंत्रण में है। यह नियंत्रण विशेष रूप से इसी ट्रस्ट पर है और पूरी तरह से व्यापक है। एक सोसाइटी के रूप में इसका पंजीकरण होना, या अपनी आय का कुछ हिस्सा स्वतंत्र रूप से अर्जित करना, इस संस्था के संवैधानिक स्वरूप को नहीं बदल सकता।"
इस फैसले के साथ ही कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस निर्णय को बरकरार रखा, जिसमें ट्रस्ट को अनुच्छेद 12 के तहत 'राज्य' (State) घोषित किया गया।
कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या सरकारी प्रस्तावों के जरिए स्थापित 'नेशनल बुक ट्रस्ट' को, एक सोसाइटी या ट्रस्ट के रूप में गठित होने के बावजूद, सरकार की एक एजेंसी या माध्यम माना जा सकता है।
ट्रस्ट की संरचना की जांच करते हुए जस्टिस मिश्रा ने अपने फैसले में 'अजय हासिया' और 'प्रदीप कुमार बिस्वास' मामलों में स्थापित सिद्धांतों का हवाला दिया। उन्होंने समझाया कि अनुच्छेद 12 के तहत किसी संस्था को 'राज्य' मानने के लिए केवल उसकी आय अर्जित करने की क्षमता को नहीं देखा जाता, बल्कि सरकार के साथ उसके वित्तीय, कार्यात्मक और प्रशासनिक संबंधों का समग्र मूल्यांकन किया जाता है। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि जांच केवल इस बात तक सीमित नहीं है कि किसी संगठन का कानूनी स्वरूप क्या है।
चूंकि नेशनल बुक ट्रस्ट की स्थापना सरकारी प्रस्तावों के माध्यम से हुई, और सरकार ही इसके अध्यक्ष की नियुक्ति करती है, इसके संचालन निकायों के सदस्यों को नामित करती है; तथा इसके वित्तीय प्रबंधन, ऑडिट और नियमों पर नियंत्रण रखती है—इसके अलावा, CAG (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) भी इस ट्रस्ट का ऑडिट करता है—इसलिए कोर्ट ने इसे 'राज्य' (State) मानने के लिए पर्याप्त आधार पाया।
अदालत ने कहा,
“सरकार इस निकाय के गठन में शामिल होती है; इसके संचालन ढांचे के एक बड़े हिस्से को तय करती है; इसके अध्यक्ष की नियुक्ति करती है; इस पद के कार्यकाल पर अपना नियंत्रण रखती है। इसके वित्तीय प्रशासन में भी भागीदारी निभाती है... ट्रस्ट के खातों और CAG द्वारा किए जाने वाले ऑडिट से जुड़े नियम यह दिखाते हैं कि इसके वित्तीय मामलों में सरकार की भागीदारी इसके ढांचे में ही गहराई से शामिल है। यह केवल कभी-कभार दिए जाने वाले अनुदान पर शर्तें थोपने तक सीमित नहीं है। इसलिए भले ही ट्रस्ट अपने प्रकाशनों से कमाई करता हो, लेकिन इससे सरकार का वह व्यापक नियंत्रण खत्म नहीं हो जाता, जो इसके संचालन ढांचे से साफ झलकता है।”
अदालत ने आगे कहा,
“सरकार की भूमिका ट्रस्ट के निर्माण से शुरू होती है, इसके संचालन ढांचे और मुख्य अधिकारी की नियुक्ति तक जाती है, इसके कार्यकारी और वित्तीय प्रशासन में रची-बसी है और ऑडिट, रिपोर्टिंग तथा संचालन ढांचे से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर सरकारी मंजूरी तक बनी रहती है। यह कोई ऐसी सीमित या सामान्य नियामक निगरानी नहीं है, जिसे संविधान के अनुच्छेद 12 के दायरे से बाहर रखा जा सके।”
इस तर्क को खारिज करते हुए कि प्रकाशनों की बिक्री से होने वाली ट्रस्ट की स्वतंत्र आय सरकारी नियंत्रण को कम कर देती है, अदालत ने कहा:
“किसी एक पहलू में वित्तीय स्वायत्तता होने का मतलब यह नहीं है कि उसे उस निकाय को नियंत्रित करने वाले कानूनी या नियामक ढांचे, उसके गठन, प्रबंधन और सरकारी निगरानी से अलग करके देखा जा सकता है।”
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल सार्वजनिक कार्य करने भर से कोई संस्था अपने आप अनुच्छेद 12 के तहत 'राज्य' (State) नहीं बन जाती। इसके लिए संस्था के कार्यों की प्रकृति के साथ साथ उस पर सरकार के नियंत्रण के दायरे पर भी विचार करना जरूरी है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह की घोषणा से ट्रस्ट कोई सरकारी विभाग नहीं बन जाएगा और न ही इसके कर्मचारी अपने आप सरकारी सेवक (Civil Servant) बन जाएंगे। अनुच्छेद 12 के तहत दर्जा मिलने का मतलब यह नहीं है कि कर्मचारियों को अपने आप वे सुरक्षाएं मिल जाएंगी, जो संविधान के अनुच्छेद 309, 310 और 311 के तहत सरकारी सेवकों को प्राप्त होती हैं।
Case Title : THE CHAIRMAN NATIONAL BOOK TRUST INDIA & ANR. VERSUS AR ABDUL GAFFAR & ORS.