गोद लेना भी प्रजनन अधिकार का हिस्सा: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- मातृत्व केवल जैविक नहीं

Update: 2026-03-18 07:17 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा कि गोद लेना (अडॉप्शन) भी व्यक्ति के प्रजनन और निर्णय लेने की स्वतंत्रता का हिस्सा है, जो अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने स्पष्ट किया कि परिवार बनाने का अधिकार केवल जैविक तरीके तक सीमित नहीं है, बल्कि गोद लेना भी उसी अधिकार का समान और वैध रूप है।

अदालत ने कहा,

“प्रजनन स्वतंत्रता केवल बच्चे को जन्म देने तक सीमित नहीं है। गोद लेना भी परिवार बनाने और माता-पिता बनने के अधिकार का समान रूप से महत्वपूर्ण हिस्सा है।”

खंडपीठ ने यह भी कहा कि बदलते समय में परिवार की परिभाषा विस्तृत हो चुकी है और गैर-पारंपरिक या अलग तरह के परिवारों को भी संविधान समान अधिकार देता है।

अदालत ने माना कि परिवार का आधार केवल जैविक संबंध नहीं बल्कि आपसी जिम्मेदारी भावनात्मक जुड़ाव और स्नेह होता है।

यह फैसला सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 की धारा 60(4) को सीमित करते हुए दिया गया, जिसमें गोद लेने वाली मां को केवल तभी मातृत्व लाभ दिया जाता था, जब बच्चा 3 महीने से कम उम्र का हो।

सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रावधान को असंवैधानिक बताते हुए कहा कि यह अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।

अदालत ने निर्देश दिया कि गोद लेने वाली मां को भी 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश मिलेगा, चाहे बच्चे की उम्र कुछ भी हो।

कोर्ट ने कहा,

“गोद लिया गया बच्चा और जैविक बच्चा समान हैं। मातृत्व की भावना और जिम्मेदारी दोनों में कोई अंतर नहीं है।”

अदालत ने यह भी दोहराया कि व्यक्ति को परिवार बनाने, बच्चों को अपनाने और उनका पालन-पोषण करने का अधिकार उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा का हिस्सा है।

इस फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि गोद लेना केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं बल्कि संवैधानिक रूप से संरक्षित एक महत्वपूर्ण अधिकार है।

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