CPC | प्री-रजिस्ट्रेशन चरण में खारिज किए गए वादों को 'ऑर्डर IV नियम 2' के तहत रजिस्टर में दर्ज किया जाना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (5 नवंबर) को यह दोहराया कि किसी वाद (Suit) को उसके रजिस्ट्रेशन से पहले भी खारिज किया जा सकता है। कोर्ट ने आदेश दिया कि जब भी किसी सिविल वाद को रजिस्ट्रेशन से पहले खारिज किया जाता है तो इस बात को 'कोड ऑफ सिविल प्रोसीजर' (दीवानी प्रक्रिया संहिता) के 'ऑर्डर IV नियम 2' के तहत रखे जाने वाले रजिस्टर में दर्ज किया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर संबंधित 'सिविल मैनुअल' या लागू नियमों में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, तो हाई कोर्ट इस संबंध में उचित कदम उठा सकते हैं।
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने अपील की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। अपीलकर्ता (वादी) इस बात से नाराज था कि ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों ने उसके सिविल वाद को प्री-रजिस्ट्रेशन चरण में ही खारिज किया था, जबकि उसने वाद में 'कॉज ऑफ एक्शन' (वाद का कारण) भी बताया था।
बेंच ने कहा,
"जब भी ट्रायल कोर्ट 'कोड' के 'ऑर्डर VII नियम 11' के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए किसी वाद को उसके रजिस्ट्रेशन से पहले खारिज करता है तो इस तथ्य को 'ऑर्डर IV नियम 2' के तहत बनाए गए रजिस्टर में दर्ज किया जाना चाहिए। अगर संबंधित 'सिविल मैनुअल' या लागू नियमों में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है तो हाईकोर्ट 'कोड' की धारा 122 के तहत मिली अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करके इस संबंध में उचित कदम उठा सकते हैं।"
कोर्ट ने जोर देकर कहा,
"अगर किसी वाद को खारिज करने के आदेश को अपील में चुनौती दी जाती है और ट्रायल कोर्ट का रिकॉर्ड मंगाया जाता है तो ऐसे में बिना रजिस्ट्रेशन या बिना नंबर वाले वाद का रिकॉर्ड होना जरूरी होगा। दूसरे शब्दों में, रजिस्ट्रेशन से पहले खारिज किए गए वादों का भी रिकॉर्ड रखा जाना चाहिए। इससे वादी द्वारा पहले शुरू की गई कार्यवाही का कुछ रिकॉर्ड उपलब्ध हो सकेगा।"
कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस फैसले की प्रति हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल और स्टेट ज्यूडिशियल एकेडमी (राज्य न्यायिक अकादमी) के निदेशकों को भेजी जाए, ताकि वे इसे आगे प्रसारित कर सकें और जरूरी कदम उठा सकें। यह निर्देश एक ऐसे मामले की सुनवाई के दौरान दिया गया, जहां पक्षों के बीच ऋण के लेन-देन को लेकर विवाद पैदा हो गया। वादी पर प्रतिवादी के पति का कर्ज था, जिसके चलते वादी ने प्रतिवादी के नाम पर एक 'सेल डीड' (बिक्री विलेख) पंजीकृत की। जब वादी अपना कर्ज चुकाने की स्थिति में आ गया तो प्रतिवादी ने उस 'सेल डीड' (जो असल में गिरवी रखी गई संपत्ति से जुड़ी थी) को वापस करने या रद्द करने से इनकार किया। इसके बाद वादी ने अदालत में मुकदमा दायर किया, जिसमें उसने संपत्ति पर अपने मालिकाना हक की घोषणा और प्रतिवादी के खिलाफ एक स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) की मांग की, ताकि प्रतिवादी संपत्ति पर वादी के शांतिपूर्ण कब्जे में कोई बाधा न डाले।
ट्रायल कोर्ट ने 'ऑर्डर VII नियम 11' (Order VII Rule 11) के तहत वादी का दावा खारिज किया। अदालत ने यह नहीं बताया कि दावा क्यों खारिज किया गया, बस यह कहा कि वादी के पक्ष में 'पुनः बिक्री' (Re-Sale) का कोई प्रावधान नहीं है। इसके खिलाफ वादी ने हाई कोर्ट में अपील की, लेकिन वहां भी नतीजा वही रहा। अंततः, वादी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
निचली अदालतों के फैसलों को पलटते हुए जस्टिस चंदुरकर ने अपने फैसले में कहा कि यदि मुकदमे की अर्जी को ध्यान से पढ़ा जाए तो इसमें 'कॉज़ ऑफ़ एक्शन' (मुकदमा दायर करने का आधार) स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों ने इस पर ध्यान नहीं दिया, क्योंकि दोनों ही अदालतों ने पूरी अर्जी को समग्र रूप से नहीं पढ़ा था।
अदालत ने कहा,
“ट्रायल कोर्ट ने वादी द्वारा वाद-पत्र (Plaint) में की गई विभिन्न मांगों पर ध्यान नहीं दिया। अदालत ने केवल इस आधार पर आगे की कार्रवाई की कि यह मामला केवल बंधक विलेख (Mortgage Deed) को छुड़ाने (Redemption) से जुड़ा है, जिसे बिक्री विलेख (Sale Deed) का रूप दिया गया। दूसरे, ट्रायल कोर्ट के लिए यह उचित नहीं था कि वह वाद-पत्र में दिए गए महत्वपूर्ण तथ्यों को अनदेखा करे या पूरे वाद-पत्र को पढ़ने से इनकार कर दे। चूंकि वाद-पत्र में स्पष्ट रूप से ऐसे तथ्य बताए गए हैं, जो मुकदमा दायर करने का आधार (Cause of Action) बनते हैं और कई तरह की राहतें मांगी गई हैं, इसलिए ट्रायल कोर्ट द्वारा इस वाद-पत्र को इस तरह सरसरी तौर पर खारिज नहीं किया जाना चाहिए।”
अदालत के अनुसार, CPC के आदेश VII नियम 11 (Order VII Rule 11) के तहत वाद-पत्र को खारिज करने की अर्जी पर सुनवाई करते समय इस बात पर विचार नहीं किया जाना चाहिए कि वादी के अंततः मुकदमा जीतने की संभावना कम है या ट्रायल के बाद मुकदमा खारिज हो जाएगा।
अदालत ने टिप्पणी की,
“अदालतों ने पूरे वाद-पत्र पर विचार किए बिना और उसे ठीक से समझे बिना ही उसे खारिज किया। भले ही ट्रायल कोर्ट को यह लगता हो कि वादी के अंततः मुकदमा जीतने की संभावना कम है और ट्रायल के बाद मुकदमा खारिज हो जाएगा, लेकिन केवल इस अनुमान के आधार पर वाद-पत्र को खारिज नहीं किया जा सकता—खासकर तब, जब उसमें मुकदमा दायर करने का कोई ठोस आधार (Cause of Action) मौजूद हो। ट्रायल के बाद मुकदमा खारिज होने की संभावना इस बात का आधार नहीं बन सकती कि ट्रायल से पहले ही वाद-पत्र को खारिज कर दिया जाए। यदि वाद-पत्र में मुकदमा दायर करने का कोई आधार (Cause of Action) बताया गया—जैसा कि इस मामले में है—और वाद-पत्र में दिए गए बयानों को देखते हुए ऐसा नहीं लगता कि कोई कानून इस मुकदमे को रोकता है, तो इस मामले में ट्रायल (सुनवाई) होनी चाहिए।”
परिणामस्वरूप, अपील स्वीकार की गई और निर्देश दिया गया कि मुकदमे को उसकी मूल स्थिति में बहाल किया जाए, ताकि कानून के अनुसार इसका निपटारा किया जा सके।
Case Title : G. PAZHANIVEL VERSUS S. THILAGAVATHY