व्यावसायिक फसलों की खेती को वन क्षेत्र में मौजूदगी को सही ठहराने के लिए 'वन अधिकार' नहीं माना जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वन क्षेत्र में किसी व्यावसायिक फसल की खेती को 'वन अधिकार' के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती, ताकि वहां कब्जे या लगातार मौजूदगी को सही ठहराया जा सके। कोर्ट ने तमिलनाडु के मेगामलाई क्षेत्र में 'वन अधिकार अधिनियम' (FRA) के तहत किए गए दावों की जांच के लिए एक समिति का गठन किया है, जिसके प्रमुख पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) होंगे।
कोर्ट ने कहा,
"इसलिए वन क्षेत्र में किसी व्यावसायिक फसल की खेती को 'वन अधिकार' के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती, ताकि वहां कब्जे या लगातार मौजूदगी को सही ठहराया जा सके।"
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ तमिलनाडु के मेगामलाई वन क्षेत्र में अतिक्रमण से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही थी। यह क्षेत्र 'श्रीविल्लिपुथुर-मेगामलाई टाइगर रिजर्व' और 'अगस्त्यमलाई लैंडस्केप' का हिस्सा है।
कोर्ट ने पूर्व CJI की अध्यक्षता में एक विशेष समिति का गठन किया। इस समिति में 'सेंट्रल एम्पावर्ड कमिटी' (CEC) के एक अधिकारी और तमिलनाडु के 'प्रधान मुख्य वन संरक्षक' (Principal Chief Conservator of Forests) भी शामिल हैं। यह समिति 'वन अधिकार अधिनियम' (FRA) के तहत दायर दावों की निगरानी और जांच करेगी। समिति को अपनी रिपोर्ट एक सीलबंद लिफाफे में कोर्ट को सौंपनी होगी।
कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के उस तर्क को खारिज किया, जिसमें कहा गया कि मेगामलाई वन क्षेत्र में 'सिल्क कॉटन' (सेमल/कपास) की खेती को 'वन अधिकार अधिनियम' के तहत पारंपरिक 'लघु वन उपज' (Minor Forest Produce) माना जा सकता है।
राज्य सरकार ने तर्क दिया था कि ऐतिहासिक रूप से सरकारी अधिकारियों ने ही 'सिल्क कॉटन' की खेती को बढ़ावा दिया था, और जब यह खेती शुरू हुई, तब संबंधित क्षेत्र अपने वर्तमान अधिसूचित रूप में 'आरक्षित वन' (Reserved Forests) नहीं थे।
हालांकि, खंडपीठ ने कहा कि कोर्ट के सामने पेश किए गए दस्तावेजों से यह साबित नहीं होता कि 'सिल्क कॉटन' (एक व्यावसायिक फसल के रूप में) को 'वन अधिकार अधिनियम' या किसी अन्य वन कानून के तहत 'लघु वन उपज' के रूप में मान्यता दी गई।
कोर्ट ने बताया कि इस अधिनियम की धारा 3(1)(c) के तहत, गांव की सीमाओं के अंदर या बाहर पारंपरिक रूप से एकत्र की जाने वाली 'लघु वन उपज' को इकट्ठा करने, उपयोग करने और उसका निपटान करने के अधिकार को मान्यता दी गई।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
"व्यावसायिक फसलों की सुनियोजित खेती की अवधारणा, प्राकृतिक रूप से मिलने वाली 'लघु वन उपज' की मूल अवधारणा के बिल्कुल विपरीत है।"
खंडपीठ ने आगे कहा कि वन क्षेत्रों में व्यावसायिक फसलों की खेती की अनुमति देने से जंगल का मूल स्वरूप ही बदल जाएगा।
अदालत ने कहा,
"इसलिए व्यावसायिक फसल की खेती को 'वन अधिकार' के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती, जिसके आधार पर वन क्षेत्र में कब्ज़ा करने या वहां बने रहने को उचित ठहराया जा सके।"
अदालत ने यह भी गौर किया कि राज्य का यह दावा—कि सिल्क कॉटन (सेमल/कपास) की खेती के लिए किसी बड़े व्यावसायिक उद्यम से न तो कोई फंडिंग मिली है और न ही उनके निर्देश पर ऐसा किया जा रहा है—इसकी और गहराई से जांच की जानी चाहिए।
अदालत ने स्पष्ट किया कि सिल्क कॉटन की खेती, जिसे एक व्यावसायिक फसल के तौर पर किया जा रहा है, अपने आप में कोई 'वन अधिकार' स्थापित नहीं करती। अदालत ने कहा कि FRA (वन अधिकार अधिनियम) के तहत सिल्क कॉटन को 'लघु वन उपज' (Minor Forest Produce) मानने के लिए कोई ठोस सबूत या आधिकारिक अधिसूचना मौजूद नहीं है।
अदालत ने जंगल से पारंपरिक रूप से वन उपज इकट्ठा करने और सुनियोजित व्यावसायिक खेती के बीच अंतर स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि वन क्षेत्रों में व्यावसायिक फसलों की खेती की अनुमति देने से जंगल का स्वरूप ही बदल जाएगा।
राज्य सरकार द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार, 4,594 लोग 5,072.64 हेक्टेयर वन भूमि पर कब्ज़ा किए हुए थे, जिसमें से 3,637.83 हेक्टेयर हिस्से पर सिल्क कॉटन की खेती की जा रही थी।
इन कब्ज़ा करने वालों को तीन श्रेणियों में बांटा गया: वे जो स्थायी रूप से वन क्षेत्र में रहते हैं और वहां खेती करते हैं; वे जो अस्थायी रूप से वहां रहते हैं और खेती करते हैं; और वे जो वन सीमा के बाहर रहते हैं लेकिन वन क्षेत्र के भीतर खेती करते हैं।
अदालत ने बाद की दो श्रेणियों में आने वाले लोगों को FRA के दायरे से बाहर रखा, क्योंकि उनका वहां रहने का आधार केवल उनकी खेती की गतिविधियां थीं।
अदालत ने दोहराया कि FRA के तहत वन क्षेत्रों में रहने वाली अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वन निवासियों को कुछ कानूनी शर्तों को पूरा करना होता है। इनमें मुख्य रूप से वहां रहना और अपनी आजीविका के लिए वन भूमि पर निर्भर होना शामिल है। अन्य पारंपरिक वन निवासियों के मामले में, एक और कानूनी शर्त यह है कि उन्हें 13 दिसंबर 2005 से पहले कम से कम तीन पीढ़ियों से, या 75 वर्षों से, वहां कब्ज़ा करके रहना चाहिए।
अदालत ने FRA के तहत कानूनी प्रक्रिया पूरी करने में राज्य द्वारा की जा रही देरी पर चिंता जताई। अदालत ने निर्देश दिया कि बाकी बची ग्राम सभाओं का गठन 30 दिनों के भीतर किया जाए और उनके गठन के पांच महीने के भीतर दावों (Claims) की प्रक्रिया पूरी कर ली जाए।
राज्य ने अदालत को सूचित किया कि लगभग 40 ग्राम सभाओं का गठन किया गया और लगभग 1,600 दावे प्राप्त हुए।
विशेष समिति को दावों के निपटारे के लिए तय समय-सीमा के बाद दो महीने के भीतर अपनी जांच पूरी करनी होगी। राज्य को मासिक प्रगति रिपोर्ट जमा करने का भी निर्देश दिया गया।
अदालत ने CEC से यह जांच करने को भी कहा कि क्या 'सिल्क कॉटन' (सेमल/कपास) को FRA (वन अधिकार अधिनियम) के तहत 'लघु वन उपज' (Minor Forest Produce) माना जा सकता है।
इस मामले पर अगली सुनवाई 1 फरवरी, 2027 को होगी।
Case Title : A. John Kennedy & Ors. v. State of Tamil Nadu & Ors