सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब सभी आरोपियों पर 'साझा इरादे' (Common Intention) को आगे बढ़ाते हुए भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 34 के साथ धारा 302 (हत्या) के तहत आरोप लगाए जाते हैं, और बाकी आरोपी बरी हो जाते हैं, तो किसी एक आरोपी को अकेले धारा 302 के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता। ऐसा तब तक नहीं किया जा सकता, जब तक कि उस आरोपी के खिलाफ धारा 302 के तहत कोई अलग और स्वतंत्र आरोप न लगाया गया हो।
कोर्ट ने यह टिप्पणी एक महिला सौ कमलबाई वामन पाटिल को बरी करते हुए की। बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने उसे अपनी बहू, सुनीताबाई की आग लगाकर हत्या करने का दोषी ठहराया था।
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने कहा कि हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता को अकेले भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 (अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 103) के तहत दोषी ठहराकर गलती की है, क्योंकि उस पर इस धारा के तहत कभी कोई अलग आरोप नहीं लगाया गया।
कोर्ट ने यह भी पाया कि हाईकोर्ट ने जिस एकमात्र 'मृत्यु पूर्व बयान' (Dying Declaration) पर भरोसा किया था, उसकी पुष्टि किसी अन्य सबूत से नहीं होती थी। इसके अलावा, पीड़िता के अन्य मृत्यु पूर्व बयान भी इस बयान से मेल नहीं खाते थे।
आरोप है कि पीड़िता के पति (A1), ससुर (A2), सास (A3 - अपीलकर्ता) और देवर (A4) उसके साथ बुरा बर्ताव करते थे, क्योंकि इस शादी से कोई बच्चा नहीं हुआ था। साथ ही, उनसे दहेज की भी मांग की जाती थी। 2005 में इन सभी आरोपियों ने कथित तौर पर अपने 'साझा इरादे' को अंजाम देते हुए पीड़िता को आग लगाई, जिससे उसकी मौत हो गई।
इसके बाद चारों आरोपियों पर IPC की धारा 498A, 342, 406 और 302 के साथ धारा 34 के तहत आरोप लगाए गए (जो अब BNS की धारा 85, 127(2), 316(2), 103 और 3(5) हैं)। सेशन कोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया। कोर्ट ने पाया कि पीड़िता के तीन 'मरणासन्न बयानों' (Dying Declarations) में विरोधाभास थे, जिस गवाह ने पीड़िता को अस्पताल पहुंचाया था, उससे पूछताछ नहीं की गई।
इसके बाद हाईकोर्ट में अपील दायर की गई। हाईकोर्ट ने आरोपी 1, 2 और 4 के बरी होने का फैसला बरकरार रखा। साथ ही अन्य आरोपों में भी सभी आरोपियों के बरी होने के फैसले को कायम रखा। हालांकि, हाईकोर्ट ने बाकी तीन आरोपियों के बरी होने के फैसले को तो बरकरार रखा, लेकिन अपीलकर्ता को IPC की धारा 302 के तहत दोषी ठहराया।
हाईकोर्ट के इस फैसले से असंतुष्ट होकर अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
Case Title : Sau. Kamalbai Waman Patil v State of Maharashtra