स्पष्टीकरण वाला बयान अवमानना के मामले में बाध्यकारी वचन नहीं माना जाएगा: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (1 सितंबर) को कहा कि अदालत के सामने दिया गया स्पष्टीकरण वाला बयान अवमानना की कार्यवाही के मकसद से बिना शर्त वाला वचन नहीं माना जा सकता, जब तक कि वह कोई गंभीर, स्पष्ट और निश्चित प्रतिबद्धता न हो जिस पर अदालत को अमल करना हो।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने तेलंगाना हाईकोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें IQuest Enterprises Pvt. Ltd. के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने से इनकार कर दिया गया। कोर्ट ने माना कि IQuest का अधिग्रहण (Acquisition) न करने का बयान केवल स्पष्टीकरण देने के मकसद से है।
कोर्ट ने कहा,
"हैदराबाद की कमर्शियल कोर्ट के सामने IQuest द्वारा अपने काउंटर एफिडेविट में दिया गया बयान (जैसा कि 01.05.2024 के आदेश में दर्ज है) बिना शर्त वाला वचन नहीं माना जा सकता। इसलिए, हाई कोर्ट का यह निष्कर्ष सही है कि इस बयान पर अवमानना की कार्रवाई नहीं बनती..."
यह फैसला रास अल खैमाह इन्वेस्टमेंट अथॉरिटी (RAKIA) द्वारा हैदराबाद के बिजनेसमैन निम्मगड्डा प्रसाद (NP) के खिलाफ विदेशी फैसले (foreign decree) को लागू करने के लिए शुरू की गई कार्यवाही से जुड़ा था। इस मामले में ब्याज सहित कुल रकम लगभग ₹950 करोड़ हो गई। कार्यवाही के दौरान, RAKIA ने IQuest Enterprises Pvt. Ltd. को मामले में शामिल करने और उसकी संपत्ति के संबंध में सुरक्षा आदेश की मांग की।
विवाद IQuest द्वारा Viatris के API बिजनेस के प्रस्तावित अधिग्रहण पर केंद्रित है। RAKIA ने आरोप लगाया कि प्रस्तावित सौदा विदेशी फैसले को लागू होने से रोकने की कोशिश का हिस्सा है। RAKIA का तर्क है कि IQuest ने कमर्शियल कोर्ट के सामने दिए गए उस वचन का उल्लंघन किया, जिसमें कहा गया कि वह अधिग्रहण की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाएगी।
कमर्शियल कोर्ट के सामने अपने काउंटर एफिडेविट में, IQuest ने कहा कि "शुरुआत में उसे Viatris के अधिग्रहण में दिलचस्पी थी; हालांकि, बाद में IQuest ने आगे न बढ़ने का फैसला किया।"
कमर्शियल कोर्ट ने बयान दर्ज किया और IQuest के खिलाफ रोक (injunction) की मांग करने वाली RAKIA की अर्जी बंद की।
इसके बाद RAKIA ने आरोप लगाया कि यह बयान अदालत के लिए एक वचन है, और Matrix तथा अन्य संस्थाओं से जुड़े बाद के सौदे उस वचन का उल्लंघन है। नतीजतन, उसने तेलंगाना हाईकोर्ट में IQuest और उसके स्टेकहोल्डर्स के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू की। हाईकोर्ट ने अवमानना की याचिका खारिज की और कहा कि IQuest का बयान सिर्फ़ स्थिति स्पष्ट करने वाला है, न कि कोई बाध्यकारी वचन। इस फैसले से असंतुष्ट होकर RAKIA सुप्रीम कोर्ट पहुंची।
कोर्ट के सामने सवाल यह है कि क्या किसी पक्ष द्वारा अपने जवाबी हलफनामे में दिया गया यह बयान—कि उसने किसी खास सौदे को आगे न बढ़ाने का फैसला किया—बाद में एक बाध्यकारी वचन माना जा सकता है, जिसका उल्लंघन करने पर कोर्ट की अवमानना मानी जाएगी?
नकारात्मक जवाब देते हुए जस्टिस मोहना के फैसले में कहा गया कि अवमानना के अधिकार क्षेत्र के तहत किसी बयान को वचन मानने के लिए वह गंभीर, स्पष्ट और ऐसा होना चाहिए, जिस पर कोर्ट कार्रवाई करे।
कोर्ट ने 1980 के बाबू राम गुप्ता बनाम सुधीर भसीन और अन्य मामले में अपने फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया,
"अगर वकील ने अपने मुवक्किल की ओर से कोई वचन दिया है तो उस वचन का दायरा और प्रकृति समझने के लिए उसका सावधानीपूर्वक अर्थ निकाला जाना चाहिए। जब रिकॉर्ड पर कोई वचन मौजूद न हो तो कोर्ट अपनी तरफ से कोई निहित वचन नहीं मान सकता।"
कानून को लागू करते हुए कोर्ट ने पाया कि IQuest का बयान बाध्यकारी वचन नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि बयान से केवल यह पता चलता है कि IQuest शुरू में Viatris का कारोबार खरीदने में रुचि रखती थी, लेकिन बाद में उसने अधिग्रहण की प्रक्रिया को आगे न बढ़ाने का फैसला किया।
इसलिए बयान में कोर्ट से ऐसा कोई स्पष्ट वादा नहीं किया गया कि IQuest भविष्य में हर हाल में इस सौदे से दूर रहेगी।
कोर्ट ने कहा कि इसे "वचन के तौर पर पक्का इरादा नहीं माना जा सकता" और यह इसके बजाय "सिर्फ़ स्थिति स्पष्ट करने वाला बयान" है।
कोर्ट ने कहा,
“हम हाईकोर्ट के निष्कर्षों से सहमत हैं। 01.05.2024 के आदेश में दर्ज, हैदराबाद की कमर्शियल कोर्ट के सामने IQuest के काउंटर एफिडेविट में दिए गए बयान को, बाबू राम गुप्ता (ऊपर बताए गए) और पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड (ऊपर बताए गए) के मामलों के तहत 'अंडरटेकिंग' (वचन) मानने के लिए पक्का इरादा नहीं माना जा सकता। यह सिर्फ़ स्थिति स्पष्ट करने वाला बयान है। IQuest ने बस इतना कहा कि उस समय उसने वियाट्रिस (Viatris) के अधिग्रहण (acquisition) के साथ आगे न बढ़ने का फ़ैसला किया।”
Cause Title: RAS AL KHAIMAH INVESTMENT AUTHORITY VERSUS MATRIX PHARMACORP PRIVATE LIMITED & ANR.