हाईकोर्ट के रिटायर जजों को पूरे देश में समान सुविधाएं मिलनी चाहिए: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को दिया समिति बनाने का निर्देश

Update: 2026-07-20 08:25 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि देशभर में हाईकोर्ट के रिटायर चीफ जस्टिस और जजों को मिलने वाली रिटायरमेंट के बाद की सुविधाएं एक समान होनी चाहिए। कोर्ट ने केंद्र सरकार को दो सप्ताह के भीतर एक समिति गठित करने का निर्देश दिया, जो इस संबंध में एकरूप दिशा-निर्देश और वित्तीय सहायता की व्यवस्था पर सिफारिशें तैयार करेगी।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहन की पीठ रिटायर हाईकोर्ट जजों को मिलने वाली सुरक्षा और अन्य सुविधाओं से जुड़ी याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि उसके समक्ष रिटायर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और जजों को उपलब्ध कराई जाने वाली कुछ आवश्यक सुविधाओं और लाभों का मुद्दा है।

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कुछ राज्यों द्वारा सुरक्षा व्यवस्था के लिए दी जा रही आर्थिक सहायता पर सवाल उठाते हुए कहा,

"45 से 50 हजार रुपये में क्या चालक और सुरक्षा कर्मी की व्यवस्था संभव है?"

चीफ जस्टिस ने कहा कि अलग-अलग राज्यों में रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली सुविधाओं में भारी असमानता है। उन्होंने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि केंद्र सरकार समिति गठित कर पूरे देश के लिए समान मानक तय करे। साथ ही आवश्यकता होने पर केंद्र सरकार वित्तीय सहायता भी उपलब्ध करा सकती है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार ऐसा नहीं करती, तो अदालत को स्वयं इस संबंध में समिति गठित करनी पड़ेगी।

इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि केंद्र सरकार को समिति गठित करने में कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने अदालत को आश्वस्त किया कि यह महत्वपूर्ण विषय है और सरकार इस पर सकारात्मक भावना के साथ कार्रवाई करेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में दर्ज किया कि घरेलू सहायक, चालक, दूरभाष सुविधा, चिकित्सा व्यय की प्रतिपूर्ति और सरकारी आवास जैसी बुनियादी सुविधाएं अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग हैं। इसी असमानता के कारण सेवानिवृत्त जजों के संगठन को पहले संबंधित अधिकारियों के समक्ष और बाद में अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा।

पीठ ने कहा कि ऐसी सुविधाएं इस आधार पर अलग-अलग नहीं हो सकतीं कि किसी जज ने किस राज्य के हाईकोर्ट में सेवा दी थी।

पीठ ने कहा,

"इन सुविधाओं को पूरे देश में समान रूप से सुनिश्चित किया जाना चाहिए। इनके प्रावधान में भिन्नता का कोई औचित्य नहीं है।"

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से अनुरोध किया कि वह दो सप्ताह के भीतर समिति गठित करे। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि समिति अपने गठन की तारीख से तीन महीने के भीतर अपनी सिफारिशें केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट, दोनों के समक्ष प्रस्तुत करे।

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