अनुच्छेद 226(3) के तहत दायर आवेदन दो सप्ताह में निपटाना हाइकोर्ट की संवैधानिक जिम्मेदारी: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक विशेष अनुमति याचिका (SLP) का निपटारा करते हुए इलाहाबाद हाइकोर्ट को संविधान के अनुच्छेद 226(3) के तहत उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी की याद दिलाई।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अंतरिम आदेश को निरस्त करने के लिए दायर आवेदन को हाइकोर्ट को दो सप्ताह के भीतर अनिवार्य रूप से तय करना होता है।
यह मामला इलाहाबाद हाइकोर्ट द्वारा पारित अंतरिम यथास्थिति आदेश से जुड़ा है, जिसे चुनौती देते हुए याचिका दायर की गई।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ ने याचिकाकर्ताओं की इस दलील पर ध्यान दिया कि अंतरिम आदेश को निरस्त करने के लिए उनका आवेदन जनवरी, 2025 से हाइकोर्ट में लंबित है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226(3) के अनुसार यदि किसी रिट याचिका में एकपक्षीय (एक्स-पार्टी) अंतरिम आदेश पारित किया गया।
दूसरी ओर से उसे निरस्त करने के लिए आवेदन दायर किया जाता है तो हाइकोर्ट को उस आवेदन का निपटारा दो सप्ताह की अवधि के भीतर करना अनिवार्य है।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
“इस स्तर पर संविधान के अनुच्छेद 226 के उप-अनुच्छेद (3) का उल्लेख करना उचित है, जो यह अनिवार्य करता है कि इस तरह का आवेदन दाखिल होने पर हाइकोर्ट उसे दो सप्ताह की अवधि में निस्तारित करेगा।”
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि इस अवधि के भीतर आवेदन का निपटारा नहीं किया जाता तो अंतरिम आदेश स्वतः प्रभावहीन हो सकता है।
यह ध्यान में रखते हुए कि संबंधित मामला पहले ही 19 जनवरी, 2026 को इलाहाबाद हाइकोर्ट में सूचीबद्ध है, सुप्रीम कोर्ट ने हाइकोर्ट से अनुरोध किया कि वह अंतरिम आदेश को निरस्त करने से जुड़े आवेदन पर शीघ्रता से सुनवाई कर उसे अपने गुण-दोष के आधार पर तय करे।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि उसने पक्षकारों द्वारा उठाए गए तर्कों के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की।
इन टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने विशेष अनुमति याचिका और उससे संबंधित सभी लंबित आवेदनों का निस्तारण कर दिया।