राजनीतिक पहचान नहीं, कानून और प्रक्रिया के आधार पर परखी जाए प्रशासनिक कार्रवाई: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी प्रशासनिक निर्णय की वैधता का परीक्षण संबंधित कानून और अपनाई गई प्रक्रिया के आधार पर किया जाना चाहिए, न कि उस व्यक्ति की राजनीतिक पहचान के आधार पर जिसने मामले को अधिकारियों के संज्ञान में लाया हो। अदालत ने कहा कि केवल इस कारण कोई प्रशासनिक निर्णय अवैध या मनमाना नहीं माना जा सकता कि उसके पीछे सत्तारूढ़ दल के किसी स्थानीय नेता का प्रतिनिधित्व या अनुरोध रहा हो।
जस्टिस संजीत पुरोहित ने यह टिप्पणी फालोदी जिले में नए राजस्व गांव खीचन विस्तार के गठन को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करते हुए की।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि नए गांव का गठन निर्धारित दिशानिर्देशों के अनुरूप नहीं किया गया और यह केवल एक स्थानीय राजनीतिक नेता के अनुरोध पर किया गया। उनका कहना था कि जांच रिपोर्टों के अनुसार गांव गठन में निर्धारित दूरी संबंधी मानदंडों का उल्लंघन हुआ।
वहीं, राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि दोनों गांवों की आबादी के केंद्र बिंदुओं के बीच की दूरी निर्धारित एक किलोमीटर से अधिक है। केवल यह तथ्य कि दोनों गांवों से संबंधित खसरे एक-दूसरे से सटे हुए हैं। इस मामले में महत्वपूर्ण नहीं है।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध दिशानिर्देशों और जांच रिपोर्टों का अवलोकन किया। अदालत ने पाया कि उपलब्ध सभी मार्गों के आधार पर नवगठित राजस्व गांव और मूल गांव की आबादी के केंद्र बिंदुओं के बीच की दूरी एक हजार मीटर से अधिक है।
अदालत ने कहा,
"सिर्फ यह निष्कर्ष कि दोनों गांवों के संबंधित खसरे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, तब तक निर्णायक नहीं हो सकता जब तक उनके आबादी केंद्रों के बीच वास्तविक दूरी का विवरण उपलब्ध न हो।"
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता जांच रिपोर्टों में दर्ज तथ्यात्मक निष्कर्षों को गलत साबित करने के लिए कोई ठोस सामग्री प्रस्तुत नहीं कर सके।
अदालत ने माना कि राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956 की धारा 16 के तहत राज्य सरकार को प्रशासनिक इकाइयों के गठन, समाप्ति या पुनर्गठन का व्यापक अधिकार प्राप्त है। नए राजस्व गांव का गठन भी इसी प्रकार का प्रशासनिक निर्णय है, जिसमें अदालत सामान्यतः हस्तक्षेप नहीं करती।
जस्टिस पुरोहित ने कहा कि जब तक किसी प्रशासनिक निर्णय में दुर्भावना, अधिकारों का दुरुपयोग या किसी वैधानिक प्रावधान का उल्लंघन साबित न हो जाए, तब तक केवल इस आधार पर हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता कि किसी राजनीतिक पदाधिकारी ने उस विषय को उठाया था।
अदालत ने कहा,
"केवल यह तथ्य कि किसी सत्तारूढ़ दल के स्थानीय सदस्य ने कोई प्रतिनिधित्व या पत्र भेजा, अपने आप में उस पर आधारित निर्णय को अवैध या मनमाना नहीं बनाता। प्रशासनिक निर्णय की वैधता का आकलन वैधानिक ढांचे और अपनाई गई प्रक्रिया के आधार पर किया जाना चाहिए, न कि केवल उस व्यक्ति की पहचान के आधार पर जिसने मामला अधिकारियों के समक्ष रखा।"
हाईकोर्ट ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व निर्णय का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया कि केवल इसलिए किसी प्रशासनिक निर्णय को अमान्य नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि उसका प्रस्ताव किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि की ओर से आया, जब तक कि दुर्भावना या कानून के उल्लंघन का ठोस आधार न हो।
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की।