परिवार के दबाव में दर्ज हुई थी दुष्कर्म की FIR: पीड़िता के बयान के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने रद्द की कार्यवाही

Update: 2026-07-23 07:13 GMT

राजस्थान हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के एक मामले में दर्ज FIR से उपजी आपराधिक कार्यवाही रद्द की।

अदालत ने यह फैसला उस समय दिया, जब पीड़िता ने स्वयं कहा कि FIR परिवार के दबाव में दर्ज कराई गई। साथ ही, उसने बताया कि वह आरोपी से विवाह कर चुकी है और दोनों अब पति-पत्नी के रूप में सुखद वैवाहिक जीवन बिता रहे हैं।

जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू ने कहा कि दोनों पक्षों ने वर्ष 2020 में विवाह किया था और आपराधिक मुकदमा लंबित रहने के बावजूद उनका रिश्ता लगभग छह वर्षों तक कायम रहा। ऐसे में मुकदमे को जारी रखने से दोनों पक्षों को केवल अनावश्यक कठिनाई होगी और उनके स्थापित वैवाहिक जीवन पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।

हाईकोर्ट ने कहा,

"दोनों पक्ष काफी पहले अपनी इच्छा से साथ रहने का निर्णय ले चुके थे और मुकदमे के बावजूद फिर से एक साथ रह रहे हैं। ऐसे में केवल इस आधार पर कि मुकदमा अंतिम चरण में पहुंच चुका है, आपराधिक कार्यवाही जारी रखने का कोई उपयोगी उद्देश्य पूरा नहीं होगा।"

मामला भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 के तहत दायर याचिका से संबंधित था। याचिकाकर्ता ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376, 376(2)(एन), 377, 384, 506 और 450 के तहत दर्ज FIR से जुड़ी पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की थी।

सुनवाई के दौरान पीड़िता ने अदालत को बताया कि उसने FIR दर्ज होने से पहले ही याचिकाकर्ता से विवाह कर लिया था। हालांकि, विवाह के बाद दोनों अपने-अपने घर लौट गए। जब उसके माता-पिता को विवाह की जानकारी मिली तो उनके दबाव में FIR दर्ज कराई गई।

पीड़िता ने यह भी बताया कि दिसंबर 2025 में वह दोबारा अपने पति के साथ रहने चली गई और 25 दिसंबर 2025 से दोनों परिवारों की सहमति से पति-पत्नी के रूप में साथ रह रहे हैं।

इन तथ्यों पर गौर करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि घटनाक्रम से स्पष्ट है कि आपराधिक कार्यवाही परिवार के दबाव का परिणाम थी।

अदालत ने यह भी कहा कि शुरुआत से ही दोनों के बीच संबंध सहमति पर आधारित थे और लगभग छह वर्षों के बाद भी उनका वैवाहिक संबंध कायम है।

हाईकोर्ट ने कहा,

"आपराधिक मुकदमा लंबित रहने और विभिन्न परिस्थितियों के बावजूद पीड़िता और याचिकाकर्ता ने पति-पत्नी के रूप में साथ रहने का फैसला किया।"

अदालत ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि विशेष परिस्थितियों में, यदि दोनों पक्षों के बीच विवाद समाप्त हो चुका हो और मुकदमा जारी रखने से न्याय का कोई उद्देश्य पूरा न होता हो, तो अदालत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग कर आपराधिक कार्यवाही रद्द कर सकती है।

हाईकोर्ट ने माना कि पीड़िता ने स्पष्ट रूप से कहा है कि अब उसे याचिकाकर्ता से कोई शिकायत नहीं है और वह उसके साथ अपना वैवाहिक जीवन जारी रखना चाहती है।

इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने कहा कि मुकदमा जारी रखना न तो न्याय के हित में होगा और न ही आपराधिक कानून के उद्देश्य की पूर्ति करेगा। इसके विपरीत, यह न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इसलिए याचिका स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता के खिलाफ पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द की गई।

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